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Rigveda / 5 / 54 / 7

न स जी॑यते मरुतो॒ न ह॑न्यते॒ न स्रे॑धति॒ न व्य॑थते॒ न रि॑ष्यति। नास्य॒ राय॒ उप॑ दस्यन्ति॒ नोतय॒ ऋषिं॑ वा॒ यं राजा॑नं वा॒ सुषू॑दथ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 54 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब ईश्वर कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : न। सः। जी॒य॒ते॒। म॒रु॒तः॒। न। ह॒न्य॒ते॒। न। स्रे॒ध॒ति॒। व्य॒थ॒ते॒। न। रि॒ष्य॒ति॒। न। अ॒स्य॒। रायः॑। उप॑। द॒स्य॒न्ति॒। न। ऊ॒तयः॑। ऋषि॑म्। वा॒। यम्। राजा॑नम्। वा॒। सुसू॑दथ ॥७॥

पदार्थ : हे (मरुतः) मनुष्यो ! (सः) वह (न) न (जीयते) जीता जाता (न) न (हन्यते) नाश किया जाता (न) न (स्रधेति) नाश होता (न) न (व्यथते) पीड़ित होता और (न) न (रिष्यति) हिंसा करता है (अस्य) इस का (न) न (रायः) धन और (न) न (ऊतयः) रक्षण आदि व्यवहार (उप, दस्यन्ति) नाश होते हैं (यम्) जिस (ऋषिम्) वेदार्थ के जाननेवाले (वा) अथवा (राजानम्) राजा को (वा) भी आप लोग (सुषूदथ) रखिये ॥७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो वृद्धावस्था वा मरणावस्था रहित, सत्, चित् और आनन्दस्वरूप, नित्य गुण, कर्म्म और स्वभाववाला जगदीश्वर है, उसकी सब आप लोग उपासना करो ॥७॥