Rigveda / 5 / 55 / 8
यत्पू॒र्व्यं म॑रुतो॒ यच्च॒ नूत॑नं॒ यदु॒द्यते॑ वसवो॒ यच्च॑ श॒स्यते॑। विश्व॑स्य॒ तस्य॑ भवथा॒ नवे॑दसः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥८॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 55 | Mantra No : 8
In English:
Seer : shyaavaashva aatreyaH | Devta : marutaH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yatpuurvya.m maruto yachcha nuutana.m yadudyate vasavo yachcha shasyate. vishvasya tasya bhavathaa navedasaH shubha.m yaataamanu rathaa avRRitsata .8.
Component Words : yat. puurvyam. marutaH. yat. cha. nuutanam. yat. udyate. vasavaH. yat. cha. shasyate. vishvasya. tasya. bhavatha. navedasaH. shubham. yaataam. anu. rathaaH. avRRitsata .8.
In Hindi:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यत्। पू॒र्व्यम्। म॒रु॒तः॒। यत्। च॒। नूत॑नम्। यत्। उ॒द्यते॑। व॒स॒वः॒। यत्। च॒। श॒स्यते॑। विश्व॑स्य। तस्य॑। भ॒व॒थ॒। नवे॑दसः। शुभ॑म्। या॒ताम्। अनु॑। रथाः। अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥८॥
पदार्थ : हे (वसवः) वास करानेवाले ! (नवेदसः) नहीं विद्यमान धन जिनके वे (मरुतः) मनुष्यो ! (यत्) जो (पूर्व्यम्) प्राचीन विद्वानों से निष्पन्न किया हुआ (यत्) जो (नूतनम्) नवीन (यत्, च) जो (उद्यते) कहा जाता है (यत्, च) और जो (शस्यते) स्तुत किया जाता है (तस्य) उस (विश्वस्य) सम्पूर्ण संसार की वैसे रक्षा करनेवाले (भवथा) हूजिये जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) वर्त्तमान होते हैं ॥८॥
भावार्थ : जो शिक्षा और विद्या के दण्ड से संसार की रक्षा करते हैं, वे ही प्रशंसित होकर कल्याण को प्राप्त होते हैं ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : यत्। पू॒र्व्यम्। म॒रु॒तः॒। यत्। च॒। नूत॑नम्। यत्। उ॒द्यते॑। व॒स॒वः॒। यत्। च॒। श॒स्यते॑। विश्व॑स्य। तस्य॑। भ॒व॒थ॒। नवे॑दसः। शुभ॑म्। या॒ताम्। अनु॑। रथाः। अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥८॥
पदार्थ : (यत्) (पूर्व्यम्) पूर्वैर्विद्वद्भिर्निष्पादितम् (मरुतः) मनुष्याः (यत्) (च) (नूतनम्) नवीनम् (यत्) (उद्यते) कथ्यते (वसवः) वासकर्त्तारः (यत्) (च) (शस्यते) स्तूयते (विश्वस्य) समग्रस्य संसारस्य (तस्य) (भवथा) (नवेदसः) न विद्यते वेदो वित्तं येषान्ते (शुभम्) (याताम्) (अनु) (रथाः) (अवृत्सत) ॥८॥
अन्वय : हे वसवो नवेदसो मरुतो ! यत्पूर्व्यं यन्नूतनं यच्चोद्यते यच्च शस्यते तस्य विश्वस्य तथा रक्षितारो भवथा। यथा शुभं यातां रथा अन्ववृत्सत ॥८॥
भावार्थ : ये शिक्षया विद्यादण्डेन जगद्रक्षन्ति त एव प्रशंसिता भूत्वा कल्याणमुपगच्छन्ति ॥८॥