Rigveda / 5 / 58 / 3
आ वो॑ यन्तूदवा॒हासो॑ अ॒द्य वृ॒ष्टिं ये विश्वे॑ म॒रुतो॑ जु॒नन्ति॑। अ॒यं यो अ॒ग्निर्म॑रुतः॒ समि॑द्ध ए॒तं जु॑षध्वं कवयो युवानः ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 58 | Mantra No : 3
In English:
Seer : shyaavaashva aatreyaH | Devta : marutaH | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : aa vo yantuudavaahaaso adya vRRiShTi.m ye vishve maruto junanti. aya.m yo agnirmarutaH samiddha eta.m juShadhva.m kavayo yuvaanaH .3.
Component Words : aa. vaH. yantu. uda.avaahaasaH. adya. vRRiShTim. ye. vishve. marutaH. junanti. ayam. yaH. agniH. marutaH. sam.aiddhaH. etam. juShadhvam. kavayaH. yuvaanaH .3.
In Hindi:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : आ। वः॒। य॒न्तु॒। उ॒द॒ऽवा॒हासः॑। अ॒द्य। वृ॒ष्टिम्। ये। विश्वे॑। म॒रुतः॑। जु॒नन्ति॑। अ॒यम्। यः। अ॒ग्निः। म॒रु॒तः॒। सम्ऽइ॑द्धः। ए॒तम्। जु॒ष॒ध्व॒म्। क॒व॒यः॒। यु॒वा॒नः॒ ॥३॥
पदार्थ : हे (कवयः) बुद्धिमान् (युवानः) युवावस्था को प्राप्त हुए (मरुतः) मनुष्यो ! (ये) जो (विश्वे) सम्पूर्ण (उदवाहासः) जल को जो धारण करते हैं उनके सदृश (मरुतः) पवन (वृष्टिम्) वृष्टि की (जुनन्ति) प्रेरणा करते हैं, वे (अद्य) इस समय (वः) आप लोगों को (आ, यन्तु) प्राप्त हों और (यः) जो (अयम्) यह (समिद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) अग्नि है (एतम्) इसको आप लोग (जुषध्वम्) सेवन करो ॥३॥
भावार्थ : जो वृष्टि करनेवाले वायु और अग्नि आदि को विशेष करके जानते हैं, वे इनको वृष्टि करने के लिये प्रेरणा करने को समर्थ होते हैं ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनर्मनुष्याः किं कुर्य्युरित्याह ॥
पदपाठ : आ। वः॒। य॒न्तु॒। उ॒द॒ऽवा॒हासः॑। अ॒द्य। वृ॒ष्टिम्। ये। विश्वे॑। म॒रुतः॑। जु॒नन्ति॑। अ॒यम्। यः। अ॒ग्निः। म॒रु॒तः॒। सम्ऽइ॑द्धः। ए॒तम्। जु॒ष॒ध्व॒म्। क॒व॒यः॒। यु॒वा॒नः॒ ॥३॥
पदार्थ : (आ) समन्तात् (वः) युष्मान् (यन्तु) प्राप्नुवन्तु (उदवाहासः) य उदकं वहन्ति तानिव (अद्य) इदानीम् (वृष्टिम्) वर्षणम् (ये) (विश्वे) सर्वे (मरुतः) वायवः (जुनन्ति) प्रेरयन्ति (अयम्) (यः) (अग्निः) पावकः (मरुतः) मनुष्याः (समिद्धः) प्रदीप्तः (एतम्) (जुषध्वम्) (कवयः) मेधाविनः (युवानः) प्राप्तयौवनाः ॥३॥
अन्वय : हे कवयो युवानो मरुतो मनुष्या ! ये विश्व उदवाहसो मरुतो वृष्टिं जुनन्ति तेऽद्य व आ यन्तु। योऽयं समिद्धोऽग्निरस्त्येतं यूयं जुषध्वम् ॥३॥
भावार्थ : ये वृष्टिकरान् वाय्वग्न्यादीन् विजानन्ति त एतान् वृष्टये प्रेरयितुं शक्नुवन्ति ॥३॥