Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 59 / 5

अश्वा॑इ॒वेद॑रु॒षासः॒ सब॑न्धवः॒ शूरा॑इव प्र॒युधः॒ प्रोत यु॑युधुः। मर्या॑इव सु॒वृधो॑ वावृधु॒र्नरः॒ सूर्य॑स्य॒ चक्षुः॒ प्र मि॑नन्ति वृ॒ष्टिभिः॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 59 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अश्वाः॑ऽइव। इत्। अ॒रु॒षासः॑। सऽब॑न्धवः। शूरा॑ऽइव। प्र॒ऽयुधः॑। प्र। उ॒त। यु॒यु॒धुः॒। मर्याः॑ऽइव। सु॒ऽवृधः॑। व॒वृ॒धुः॒। नरः॑। सूर्य॑स्य। चक्षुः॑। प्र। मि॒न॒न्ति॒। वृ॒ष्टिऽभिः॑ ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वान् जनो ! (सबन्धवः) तुल्य बन्धु जिनके ऐसे (नरः) नायक आप लोग (अरुषासः) रक्त आदि गुणों से विशिष्ट (अश्वाइव, इत्) घोड़ों के सदृश ही शीघ्र चलिये (उत) और (प्रयुधः) अत्यन्त युद्ध करनेवाले (शूराइव) शूरवीरों के सदृश (प्र, युयुधुः) अत्यन्त युद्ध करिये तथा (सुवृधः) उत्तम प्रकार बढ़नेवाले (मर्याइव) मनुष्यों के सदृश (वावृधुः) बढ़िये और पवन (सूर्यस्य) सूर्य्य देव के (चक्षुः) देखता जिससे उसको (वृष्टिभिः) वर्षाओं से जैसे वैसे शत्रुओं की सेनाओं को (प्र, मिनन्ति) अत्यन्त नाश करते हैं, वे सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो घोड़ों के सदृश बलिष्ठ, शूरवीरों के सदृश भयरहित, मनुष्यों के सदृश विचारशील और सूर्य के सदृश अविद्यारूपी अन्धकार के निवारक हैं, वे सब के कल्याण के लिये होते हैं ॥५॥