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Rigveda / 5 / 61 / 12

येषां॑ श्रि॒याधि॒ रोद॑सी वि॒भ्राज॑न्ते॒ रथे॒ष्वा। दि॒वि रु॒क्मइ॑वो॒परि॑ ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 61 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : तरन्तो वैददश्विः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उपदेश विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : येषा॑म्। श्रि॒या। अधि॑। रोद॑सी॒ इति॑। वि॒ऽभ्राज॑न्ते। रथे॑षु। आ। दि॒वि। रु॒क्मःऽइ॑व। उ॒परि॑ ॥१२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (येषाम्) जिन विद्वानों की (श्रिया) शोभा वा लक्ष्मी से, धर्मयुक्त व्यवहार (दिवि) कामना में (रुक्मइव) प्रीतिकारक सुवर्ण आदि पदार्थ जैसे वैसे (विभ्राजन्ते) शोभित होते हैं और जो (रथेषु) विमान आदि वाहनों में (आ, अधि) विराजित होवें वे (उपरि) ऊपर (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश प्रकाशित होते हैं ॥१२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो धर्मयुक्त पुरुषार्थ से धन आदि को इकट्ठे करते हैं, वे सूर्य्य के किरणों के सदृश प्रकाशित यशवाले होते हैं ॥१२॥