Rigveda / 5 / 64 / 2
ता बा॒हवा॑ सुचे॒तुना॒ प्र य॑न्तमस्मा॒ अर्च॑ते। शेवं॒ हि जा॒र्यं॑ वां॒ विश्वा॑सु॒ क्षासु॒ जोगु॑वे ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 64 | Mantra No : 2
In English:
Seer : archanaanaa aatreyaH | Devta : mitraavaruNau | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : taa baahavaa suchetunaa pra yantamasmaa archate. sheva.m hi jaarya.m vaa.m vishvaasu kShaasu joguve .2.
Component Words : taa. baahavaa. su.achetunaa. pra. yantam. asmai. archate. shevam. hi. jaaryam. vaam. vishvaasu. kShaasu. joguve .2.
In Hindi:
ऋषि : अर्चनाना आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : ता। बा॒हवा॑। सु॒ऽचे॒तुना॑। प्र। य॒न्त॒म्। अ॒स्मै॒। अर्च॑ते। शेव॑म्। हि। जा॒र्य॑म्। वा॒म्। विश्वा॑सु। क्षासु॑। जोगु॑वे ॥२॥
पदार्थ : हे प्राण और उदान वायु के सदृश वर्त्तमानो ! (ता) वे दोनों आप (बाहवा) बाहु और (सुचेतुना) उत्तम विज्ञान से (अस्मै) इस (अर्चते) सत्कार करनेवाले जन के लिये (शेवम्) सुख को (हि) ही (प्र, यन्तम्) प्रयत्न करते हुए (वाम्) आप दोनों का (जार्यम्) जरा वृद्धावस्था में उत्पन्न विषय का मैं (विश्वासु) सम्पूर्ण (क्षासु) भूमियों में (जोगुवे) उपदेश करता हूँ, वैसे उसकी आप लोग प्रशंसा करो ॥२॥
भावार्थ : जो मनुष्य सब पृथिवी पर विद्या और बाहुबल से उत्तम पुरुषों के लिये सुख देते हैं, उनके लिये हम लोग भी सुख देवें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : अर्चनाना आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : ता। बा॒हवा॑। सु॒ऽचे॒तुना॑। प्र। य॒न्त॒म्। अ॒स्मै॒। अर्च॑ते। शेव॑म्। हि। जा॒र्य॑म्। वा॒म्। विश्वा॑सु। क्षासु॑। जोगु॑वे ॥२॥
पदार्थ : (ता) तौ (बाहवा) बाहुना (सुचेतुना) उत्तमविज्ञानेन (प्र) (यन्तम्) प्रयत्नं कुर्वन्तम् (अस्मै) (अर्चते) सत्कर्त्रे (शेवम्) सुखम् (हि) (जार्यम्) जरावस्थाजन्यम् (वाम्) युवयोः (विश्वासु) समग्रासु (क्षासु) भूमिषु (जोगुवे) उपदिशामि ॥२॥
अन्वय : हे मित्रावरुणौ ! ता युवां बाहवा सुचेतुनाऽस्मा अर्चते शेवं हि प्र यन्तं वां जार्यमहं विश्वासु क्षासु जोगुवे तथा तं प्रशंसतम् ॥२॥
भावार्थ : ये सर्वस्यां पृथिव्यां विद्याबाहुबलाभ्यामुत्तमेभ्यः सुखं प्रयच्छन्ति तेभ्यो वयमपि सुखं प्रयच्छेम ॥२॥