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Rigveda / 5 / 64 / 5

आ नो॑ मित्र सुदी॒तिभि॒र्वरु॑णश्च स॒धस्थ॒ आ। स्वे क्षये॑ म॒घोनां॒ सखी॑नां च वृ॒धसे॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 64 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अर्चनाना आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ। नः॒। मि॒त्र॒। सु॒दी॒तिऽभिः॑। वरु॑णः। च॒। स॒धऽस्थे॑। आ। स्वे। क्षये॑। म॒घोना॑म्। सखी॑नाम्। च॒। वृ॒धसे॑ ॥५॥

पदार्थ : हे (मित्र) मित्र आप और (वरुणः) श्रेष्ठ जन ! आप दोनों (सुदीतिभिः) अच्छे प्रकाशों से (मघोनाम्) प्रशंसित धन जिसके ऐसे (सखीनाम्) मित्रों और (नः) हम लोगों को (वृधसे) वृद्धि के लिये (स्वे) अपने (क्षये) निवास स्थान में (आ) सब और बसिये (सधस्थे, च) और तुल्यस्थान में (आ) सब ओर से बसिये तथा हम लोग भी आप दोनों के निवास स्थान (च) और तुल्यस्थान में बसें ॥५॥

भावार्थ : वे ही मित्र श्रेष्ठ हैं, जो परस्पर की उन्नति के लिये सुख दुःख और सङ्ग में प्रयत्न करते हैं ॥५॥