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Rigveda / 5 / 65 / 3

ता वा॑मिया॒नोऽव॑से॒ पूर्वा॒ उप॑ ब्रुवे॒ सचा॑। स्वश्वा॑सः॒ सु चे॒तुना॒ वाजाँ॑ अ॒भि प्र दा॒वने॑ ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 65 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : रातहव्य आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। वा॒म्। इ॒या॒नः। अव॑से। पूर्वौ॑। उप॑। ब्रु॒वे॒। सचा॑। सु॒ऽअश्वा॑सः। सु। चे॒तुना॑। वाजा॑न्। अ॒भि। प्र। दा॒वने॑ ॥३॥

पदार्थ : हे प्राण और उदान के समान वर्तमानो ! (स्वश्वासः) अच्छे घोड़े जिनके ये (सु, चेतुना) उत्तम ज्ञानवान् के साथ (दावने) देनेवाले के लिये (वाजान्) संग्रामों के (अभि, प्र) सम्मुख अच्छे प्रकार कहें उनको मैं (उप, ब्रुवे) समीप में कहूँ। हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! जिन (पूर्वौ) प्रथम विद्या पढ़े हुए (वाम्) आप दोनों को (इयानः) प्राप्त होता हुआ (अवसे) रक्षा आदि के लिये वर्त्तमान हूँ (ता) उन (सचा) मिले हुओं के मैं समीप में कहता हूँ ॥३॥

भावार्थ : जैसे उपदेशक जन उपदेश देवें, वैसे ही जिनको उपदेश दिया जाये वे औरों को भी उपदेश करें ॥३॥