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Rigveda / 5 / 66 / 2

ता हि क्ष॒त्रमवि॑ह्रुतं स॒म्यग॑सु॒र्य१॒॑माशा॑ते। अध॑ व्र॒तेव॒ मानु॑षं॒ स्व१॒॑र्ण धा॑यि दर्श॒तम् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 66 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : रातहव्य आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। हि। क्ष॒त्रम्। अवि॑ऽह्रुतम्। स॒म्यक्। अ॒सु॒र्य॑म्। आशा॑ते॒ इति॑। अध॑। व्र॒ताऽइ॑व। मानु॑षम्। स्वः॑। न। धा॒यि॒। द॒र्श॒तम् ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (ता) वे (हि) ही (अविह्रुतम्) नहीं कुटिल (असुर्य्यम्) विद्वानों के लिये हितकारक (सम्यक्) उत्तम प्रकार चलनेवाले (क्षत्रम्) धन वा राज्य को (आशाते) व्याप्त होते हैं (अध) इसके अनन्तर जिन्होंने हित (मानुषम्) मनुष्यसम्बन्धी (दर्शतम्) देखने योग्य (व्रतेव) कर्म्मों के सदृश और (स्वः) सुख के (न) सदृश (धायि) धारण किया ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । सब मनुष्य धर्म पथ से सुख और कर्म्म को धारण करें ॥२॥