Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 66 / 4

अधा॒ हि काव्या॑ यु॒वं दक्ष॑स्य पू॒र्भिर॑द्भुता। नि के॒तुना॒ जना॑नां चि॒केथे॑ पूतदक्षसा ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 66 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : रातहव्य आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। हि। काव्या॑। यु॒वम्। दक्ष॑स्य। पूः॒ऽभिः। अ॒द्भुता॒। नि। के॒तुना॑। जना॑नाम्। चि॒केथे॒ इति॑। पू॒त॒ऽद॒क्ष॒सा॒ ॥४॥

पदार्थ : हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! (पूतदक्षसा) पवित्र बल जिनका ऐसे (युवम्) आप दोनों (केतुना) बुद्धि से (अद्भुता) आश्चर्य्यरूप (काव्या) कवियों के कर्म्मों को (चिकेथे) जानते हैं (अधा) इसके अनन्तर (हि) जिससे (जनानाम्) मनुष्यों के (दक्षस्य) बलसम्बन्धी (पूर्भिः) नगरों से (नि) निरन्तर करके जानते हैं, उनका हम लोग सदा सत्कार करें ॥४॥

भावार्थ : विद्वानों को यह योग्य है कि स्वयं पूर्ण विद्वान् होके अज्ञजनों को अध्यापन और उपदेश से उपकृत करें ॥४॥