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Rigveda / 1 / 36 / 2

जना॑सो अ॒ग्निं द॑धिरे सहो॒वृधं॑ ह॒विष्म॑न्तो विधेम ते । स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ इ॒हावि॒ता भवा॒ वाजे॑षु सन्त्य ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 36 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्सतः पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर भी अगले मन्त्र में उक्त विषय का उपदेश किया है।

पदपाठ : जना॑सः । अ॒ग्निम् । द॒धि॒रे॒ । स॒हः॒ऽवृध॑म् । ह॒विष्म॑न्तः । वि॒धे॒म॒ । ते॒ । सः । त्वम् । नः॒ । अ॒द्य । सु॒ऽमनाः॑ । इ॒ह । अ॒वि॒ता । भव॑ । वाजे॑षु । स॒न्त्य॒॥

पदार्थ : हे (सन्त्य) सब वस्तु देनेहारे ईश्वर ! जैसे (हविष्मन्तः) उत्तम देने लेने योग्य वस्तुवाले (जनासः) विद्या में प्रसिद्ध हुए विद्वान् लोग जिस (ते) आपके आश्रय का (दधिरे) धारण करते हैं वैसे उन (सहोवृधम्) बल को बढ़ानेवाले (अग्निम्) सबके रक्षक आपको हम लोग (विधेम) सेवन करें (सः) सो (सुमनाः) उत्तम ज्ञानवाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (नः) हम लोगों के (इह) इस संसार और (वाजेषु) युद्धो में (अविता) रक्षक और सब विद्याओं में प्रवेश करानेवाले (भव) हूजिये ॥२॥

भावार्थ : मनुष्यों को एक अद्वितीय परमेश्वर की उपासना ही से संतुष्ट रहना चाहिये क्योंकि विद्वान् लोग परमेश्वर के स्थान में अन्य वस्तु को उपासना भाव से स्वीकार कभी नहीं करते इसी कारण उनका युद्ध वा इस संसार में कभी पराजय दीख नहीं पड़ता क्योंकि वे धार्मिक ही होते हैं और इसीसे ईश्वर की उपासना नहीं करनेवाले उनके जीतने को समर्थ नहीं होते, क्योंकि ईश्वर जिनकी रक्षा करनेवाला है उनका कैसे पराजय हो सकता है ॥२॥