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Rigveda / 5 / 69 / 2

इरा॑वतीर्वरुण धे॒नवो॑ वां॒ मधु॑मद्वां॒ सिन्ध॑वो मित्र दुह्रे। त्रय॑स्तस्थुर्वृष॒भास॑स्तिसृ॒णां धि॒षणा॑नां रेतो॒धा वि द्यु॒मन्तः॑ ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 69 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : यजत आत्रेयः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : इरा॑वतीः। व॒रु॒ण॒। धे॒नवः॑। वा॒म्। मधु॑ऽमत्। वा॒म्। सिन्ध॑वः। मि॒त्र॒। दु॒ह्रे॒। त्रयः॑। त॒स्थुः॒। वृ॒ष॒भासः॑। ति॒सृ॒णाम्। धि॒षणा॑नाम्। रे॒तः॒ऽधाः। वि। द्यु॒ऽमन्तः॑ ॥२॥

पदार्थ : हे (वरुण) उत्तम कर्म्म के करनेवाले (मित्र) मित्र ! (वाम्) आप दोनों की जो (इरावतीः) बहुत अन्न आदि सामग्रियाँ (धेनवः) और वाणियाँ गौओं के सदृश (मधुमत्) मधुमान् जैसे हो, वैसे (दुह्रे) अच्छे प्रकार पूरित करती हैं और जो (सिन्धवः) नदियाँ वे (वाम्) आप दोनों को उत्तम प्रकार पूरित करती हैं (तिसृणाम्) तीन प्रकार के (धिषणानाम्) कर्म्म, उपासना और ज्ञान के जाननेवालों के (त्रयः) तीन (द्युमन्तः) उत्तम कामनाओं से युक्त (वृषभासः) वर्षानेवाले (रेतोधाः) और जो वीर्य्य को धारण करता है वह (वि) विशेष करके (तस्थुः) स्थित होते हैं, उनको आप दोनों संप्रयुक्त करिये ॥२॥

भावार्थ : हे सब के मित्र जनो ! आप लोग गौ के सदृश सुख के देनेवाले, नदी के सदृश मल के दूर करने, बुद्धि के देने और कामनाओं की सिद्धि के देनेवाले हूजिये ॥२॥