Rigveda / 5 / 75 / 5
बो॒धिन्म॑नसा र॒थ्ये॑षि॒रा ह॑वन॒श्रुता॑। विभि॒श्च्यवा॑नमश्विना॒ नि या॑थो॒ अद्व॑याविनं॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म् ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 75 | Mantra No : 5
In English:
Seer : amahiiyuH | Devta : ashvinau | Metre : pa~NktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : bodhinmanasaa rathyeShiraa havanashrutaa. vibhishchyavaanamashvinaa ni yaatho advayaavina.m maadhvii mama shruta.m havam .5.
Component Words : bodhit.amanasaa. rathyaa. iShiraa. havana.ashrutaa. vi.abhiH. chyavaanam. ashvinaa. ni. yaathaH. advayaavinam. maadhvii iti. mama. shrutam. havam .5.
In Hindi:
ऋषि : अमहीयुः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : बो॒धित्ऽम॑नसा। र॒थ्या॑। इ॒षि॒रा। ह॒व॒न॒ऽश्रुता॑। विऽभिः॑। च्यवा॑नम्। अ॒श्वि॒ना॒। नि। या॒थः॒। अद्व॑याविनम्। माध्वी॒ इति॑। मम॑। श्रु॒त॒म्। हव॑म् ॥५॥
पदार्थ : हे (रथ्या) रथों में श्रेष्ठ (इषिरा) चलनेवाले (हवनश्रुता) आह्वान सुना गया जिनका और (बोधिन्मनसा) बोधित मन जिनका ऐसे (माध्वी) मधुर स्वभाववाले (अश्विना) विद्या के अध्यापक और उपदेशक ! आप दोनों (अद्वयाविनम्) द्वन्द्वभाव से रहित (विभिः) पक्षियों के साथ (च्यवानम्) पूँछते हुए को (नि) अत्यन्त (याथः) प्राप्त होते हैं और (मम) मेरे (हवम्) आह्वान को भी (श्रुतम्) सुनिये ॥५॥
भावार्थ : जो मनुष्य शुद्ध अन्तःकरणवाले, प्राप्त हुई शिल्पविद्या जिनको ऐसे और कपटरहित होकर विद्यार्थियों के परीक्षक हैं, वे जगत् के मङ्गलकारक होते हैं ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : अमहीयुः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
पदपाठ : बो॒धित्ऽम॑नसा। र॒थ्या॑। इ॒षि॒रा। ह॒व॒न॒ऽश्रुता॑। विऽभिः॑। च्यवा॑नम्। अ॒श्वि॒ना॒। नि। या॒थः॒। अद्व॑याविनम्। माध्वी॒ इति॑। मम॑। श्रु॒त॒म्। हव॑म् ॥५॥
पदार्थ : (बोधिन्मनसा) बोधितं मनो ययोस्तौ (रथ्या) रथेषु साधू (इषिरा) गन्तारौ (हवनश्रुता) हवनं श्रुतं ययोस्तौ (विभिः) पक्षिभिस्सह (च्यवानम्) पृच्छन्तम् (अश्विना) विद्याऽध्यापकोपदेशकौ (नि) नितराम् (याथः) प्राप्नुथः (अद्वयाविनम्) इन्द्रभावरहितम् (माध्वी) (मम) (श्रुतम्) (हवम्) ॥५॥
अन्वय : हे रथ्येषिरा हवनश्रुता बोधिन्मनसा माध्वी अश्विना ! युवामद्वयाविनं विभिश्च्यवानं नि याथो मम हवं च श्रुतम् ॥५॥
भावार्थ : ये मनुष्याः शुद्धान्तःकरणाः प्राप्तशिल्पविद्या निष्कपटा विद्यार्थिनां परीक्षकाः सन्ति ते जगन्मङ्गलकरा भवन्ति ॥५॥