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Rigveda / 1 / 36 / 7

तं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते । होत्रा॑भिर॒ग्निं मनु॑षः॒ समि॑न्धते तिति॒र्वांसो॒ अति॒ स्रिधः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 36 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : अग्निः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी अर्थ का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : तम् । घ॒ । ई॒म् । इ॒त्था । न॒म॒स्विनः॑ । उप॑ । स्व॒ऽराज॑म् । आ॒स॒ते॒ । होत्रा॑भिः । अ॒ग्निम् । मनु॑षः । सम् । इ॒न्ध॒ते॒ । ति॒ति॒र्वांसः॑ । अति॑ । स्रिधः॑॥

पदार्थ : जो (नमस्विनः) उत्तम सत्कार करनेवाले (मनुषः) मनुष्य (होत्राभिः) हवनयुक्त सत्य क्रियाओं से (स्वराजम्) अपने राजा (अग्निम्) ज्ञानवान् सभाध्यक्ष को (घ) ही (उपासते) उपासना और (तम्) उसीका (समिन्धते) प्रकाश करते हैं वे मनुष्य (स्रिधः) हिंसा नाश करनेवाले शत्रुओं को (अति तितिर्वांसः) अच्छे प्रकार जीतकर पार हो सकते हैं ॥७॥

भावार्थ : कोई भी मनुष्य सभाध्यक्ष की उपासना करनेवाले भृत्य और सभासदों के विना अपने राज्य की सिद्धि को प्राप्त होकर शत्रुओं से विजय को प्राप्त नहीं हो सकता ॥७॥