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Rigveda / 5 / 77 / 5

सम॒श्विनो॒रव॑सा॒ नूत॑नेन मयो॒भुवा॑ सु॒प्रणी॑ती गमेम। आ नो॑ र॒यिं व॑हत॒मोत वी॒राना विश्वा॑न्यमृता॒ सौभ॑गानि ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 77 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : अश्विनौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सम्। अ॒श्विनोः। अव॑सा। नूत॑नेन। म॒यः॒ऽभुवा॑। सु॒ऽप्रनी॑ती। ग॒मे॒म॒। आ। नः॒। र॒यिम्। व॒ह॒त॒म्। आ। उ॒त। वी॒रान्। आ। विश्वा॑नि। अ॒मृ॒ता॒। सौभ॑गानि ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (अश्विनोः) अग्नि और जल के समीप से (नूतनेन) नवीन (मयोभुवा) सुख के साधक (अवसा) रक्षण आदि और (सुप्रणीती) श्रेष्ठ नीति से (नः) हम अपने लिये (रयिम्) धन को (आ, वहतम्) प्राप्त कराते हुए को और हमारे लिये (वीरान्) शूरता आदि गुणों से युक्त पुरुषों को (उत) और (विश्वानि) संपूर्ण (अमृता) जलों के सदृश सुखकारक (सौभगानि) सुन्दर ऐश्वर्य्यों को प्राप्त कराते हुए को (सम्, आ, गमेम) मिलें, वैसे उनको आप लोग भी (आ) उत्तम प्रकार मिलिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे यथार्थवक्ता जन सब के साथ वर्त्ताव करें, वैसे इन सब लोगों को वर्त्ताव करना चाहिये ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, जल, विद्वान् और राजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सतहत्तरवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥