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Rigveda / 5 / 78 / 7

यथा॒ वातः॑ पुष्क॒रिणीं॑ समि॒ङ्गय॑ति स॒र्वतः॑। ए॒वा ते॒ गर्भ॑ एजतु नि॒रैतु॒ दश॑मास्यः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 78 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : सप्तवध्रिरात्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : कैसा गर्भ और जन्म इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यथा॑। वातः॑। पु॒ष्क॒रिणी॑म्। स॒म्ऽइ॒ङ्गय॑ति। स॒र्वतः॑। ए॒व। ते॒। गर्भः॑। ए॒ज॒तु॒। निः॒ऽऐतु॑। दश॑ऽमास्यः ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यथा) जिस प्रकार से (वातः) पवन (पुष्करिणीम्) छोटे तालाबों को (सर्वतः) सब ओर से (समिङ्गयति) उत्तम प्रकार हिलाता है, वैसे (एवा) ही (ते) आपका (गर्भः) जो धारण किया जाता वह गर्भ (एजतु) कंपित होवे और (दशमास्यः) दश महीनों में हुआ (निरैतु) निकले, ऐसा जानो ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो स्त्रीपुरुष ब्रह्मचर्य्य से विद्या को पढ़ के विवाह करें तो दशवें मास में प्रसव हो, ऐसा जानना चाहिये ॥७॥