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Rigveda / 5 / 79 / 8

उ॒त नो॒ गोम॑ती॒रिष॒ आ व॑हा दुहितर्दिवः। सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ शु॒क्रैः शोच॑द्भिर॒र्चिभिः॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 79 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : सत्यश्रवा आत्रेयः | देवता : उषाः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। नः॒। गोऽम॑तीः। इषः॑। आ। व॒ह॒। दु॒हि॒तः॒। दि॒वः॒। सा॒कम्। सूर्य॑स्य। र॒श्मिऽभिः॑। शु॒क्रैः। शोच॑त्ऽभिः। अ॒र्चिऽभिः। सुऽजा॑ते। अश्व॑ऽसूनृते ॥८॥

पदार्थ : हे (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञान से युक्त और (दिवः) प्रकाशमान की (दुहितः) कन्या के सदृश वर्त्तमान स्त्रि ! (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (रश्मिभिः) किरणों के (साकम्) साथ (उत) और (शुक्रैः) शुद्ध (शोचद्भिः) पवित्र करनेवाले (अर्चिभिः) श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाव के साथ (नः) हम लोगों को (गोमतीः) गौवें विद्यमान जिनमें उन (इषः) अन्न आदिकों को (आ, वह) सब प्रकार से प्राप्त कराइये ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणों से उत्पन्न उषा उपकार करनेवाली होती है, वैसे ही शुभ गुण, कर्म और स्वभावों के सहित स्त्री आनन्द की उपकार करनेवाली होती है ॥८॥