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Rigveda / 1 / 36 / 12

रा॒यस्पू॑र्धि स्वधा॒वोऽस्ति॒ हि तेऽग्ने॑ दे॒वेष्वाप्य॑म् । त्वं वाज॑स्य॒ श्रुत्य॑स्य राजसि॒ स नो॑ मृळ म॒हाँ अ॑सि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 36 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर भी अगले मंत्र में उन्हीं राजपुरुषों के गुणों का उपदेश किया है।

पदपाठ : रा॒यः । पू॒र्धि॒ । स्वध॒ा॒ऽवः॒ । अ॒स्ति॒ । हि । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । दे॒वेषु॑ । आप्य॑म् । त्वम् । वाज॑स्य । श्रुत्य॑स्य । रा॒ज॒सि॒ । सः । नः॑ । मृ॒ळ्ह॒ । म॒हान् । अ॒सि॒॥

पदार्थ : हे (स्वधावः) भोगने योग्य अन्नादि पदार्थों से युक्त (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी सभाध्यक्ष ! (हि) जिसकारण (ते) आपकी (देवेषु) विद्वानों के बीच में (आप्यम्) ग्रहण करने योग्य मित्रता (अस्ति) है इसलिये आप (रायः) विद्या, सुवर्ण और चक्रवर्त्ति राज्यादि धनों को (पूर्धि) पूर्ण कीजिये जो आप (महान्) बड़े-२ गुणों से युक्त (असि) हैं और (श्रुत्यस्य) सुनने के योग्य (वाजस्य) युद्ध के बीच में प्रकाशित होते हैं (सः) सो (त्वम्) पुत्र के तुल्य प्रजा की रक्षा करने हारे आप (नः) हम लोगों को (मृड) सुखयुक्त कीजिये ॥१२॥

भावार्थ : वेदों को जाननेवाले उत्तम विद्वानों में मित्रता रखते हुए सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को उचित है कि अन्नधन आदि पदार्थों के कोशों की निरन्तर भर और प्रसिद्ध डाकुओं के साथ निरन्तर युद्ध करने को समर्थ होके प्रजा के लिये बड़े-२ सुख देनेवाले होवें ॥१२॥