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Rigveda / 5 / 83 / 5

यस्य॑ व्र॒ते पृ॑थि॒वी नन्न॑मीति॒ यस्य॑ व्र॒ते श॒फव॒ज्जर्भु॑रीति। यस्य॑ व्र॒त ओष॑धीर्वि॒श्वरू॑पाः॒ स नः॑ पर्जन्य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 83 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः | देवता : पृथिवी | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह मेघ कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यस्य॑। व्र॒ते। पृ॒थि॒वी। नन्न॑मीति। यस्य॑। व्र॒ते। श॒फऽव॑त्। जर्भु॑रीति। यस्य॑। व्र॒ते। ओष॑धीः। वि॒श्वऽरू॑पाः। सः। नः॒। प॒र्ज॒न्य॒। महि॑। शर्म॑। य॒च्छ॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (पर्जन्य) मेघ के सदृश वर्तमान विद्वन् ! (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म्म में (पृथिवी) भूमि (नन्नमीति) अत्यन्त नम्र होती और (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म्म में (शफवत्) खुर के तुल्य (जर्भुरीति) निरन्तर धारण करती है और (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म में (विश्वरूपाः) अनेक प्रकार की (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, उस मेघ की विद्या से युक्त (सः) वह आप (नः) हम लोगों के लिये (महि) बड़े (शर्म) गृह को (यच्छ) दीजिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो वृष्टियाँ न होवें तो किसी का भी जीवन न होवे ॥५॥