Rigveda / 5 / 87 / 5
स्व॒नो न वोऽम॑वान्रेजय॒द्वृषा॑ त्वे॒षो य॒यिस्त॑वि॒ष ए॑व॒याम॑रुत्। येना॒ सह॑न्त ऋ॒ञ्जत॒ स्वरो॑चिषः॒ स्थार॑श्मानो हिर॒ण्ययाः॑ स्वायु॒धास॑ इ॒ष्मिणः॑ ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 87 | Mantra No : 5
In English:
Seer : evayaamarudaatreyaH | Devta : marutaH | Metre : bhurigjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : svano na vo.amavaanrejayadvRRiShaa tveSho yayistaviSha evayaamarut. yenaa sahanta RRI~njata svarochiShaH sthaarashmaano hiraNyayaaH svaayudhaasa iShmiNaH .5.
Component Words : svanaH. na. vaH. ama.avaan. rejayat. vRRiShaa. tveShaH. yayiH. taviShaH. evayaamarut. yena. sahantaH. RRI~njata. sva.arochiShaH. sthaaH.arashmaanaH. hiraNyayaaH. su.aaayudhaasaH. iShmiNaH .5.
In Hindi:
ऋषि : एवयामरुदात्रेयः | देवता : मरूतः | छन्द : भुरिग्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर विद्वान् राजाजन कैसे होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : स्व॒नः। न। वः॒। अम॑ऽवान्। रे॒ज॒य॒त्। वृषा॑। त्वे॒षः। य॒यिः। त॒वि॒षः। ए॒व॒याम॑रुत्। येन॑। सह॑न्तः। ऋ॒ञ्जत॑। स्वऽरो॑चिषः। स्थाःऽर॑श्मानः। हि॒र॒ण्ययाः॑। सु॒ऽआ॒यु॒धासः॑। इ॒ष्मिणः॑ ॥५॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! वह (वः) आप लोगों के मध्य में (स्वनः) शब्द के (न) समान (अमवान्) गृहवाला (वृषा) बलिष्ठ और (त्वेषः) प्रकाशवान् (तविषः) बल से (ययिः) प्राप्त होनेवाला (एवयामरुत्) बुद्धिमान् मनुष्य व्यवहारों को (रेजयत्) कंपित कराता है (येना) जिस पुरुष से (सहन्तः) सहन करनेवाले (स्वरोचिषः) अपने से प्रकाश जिनका ऐसे और (स्थारश्मानः) स्थिर किरणों के सदृश व्यवहार जिनके तथा (हिरण्ययाः) तेजस्वरूप (स्वायुधासः) अपने आयुधोंवाले और (इष्मिणः) बहुत प्रकार की इच्छावाले जन आप लोग अपने प्रयोजनों को (ऋञ्जत) सिद्ध करें ॥५॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो प्रकाशित धर्म्मयुक्त व्यवहारवाले तथा शम, दम आदि से युक्त, तेजस्वी, बलवाले और युद्धविद्या में कुशल होवें, वे ही विजयी होते हैं ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : एवयामरुदात्रेयः | देवता : मरूतः | छन्द : भुरिग्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनर्विद्वांसो राजजनाः कीदृशा भवन्तीत्याह ॥५॥
पदपाठ : स्व॒नः। न। वः॒। अम॑ऽवान्। रे॒ज॒य॒त्। वृषा॑। त्वे॒षः। य॒यिः। त॒वि॒षः। ए॒व॒याम॑रुत्। येन॑। सह॑न्तः। ऋ॒ञ्जत॑। स्वऽरो॑चिषः। स्थाःऽर॑श्मानः। हि॒र॒ण्ययाः॑। सु॒ऽआ॒यु॒धासः॑। इ॒ष्मिणः॑ ॥५॥
पदार्थ : (स्वनः) शब्दः (न) इव (वः) युष्माकम् (अमवान्) गृहवन् (रेजयत्) कम्पयते (वृषा) बलिष्ठः (त्वेषः) दीप्तिमान् (ययिः) याता (तविषः) बलात् (एवयामरुत्) (येना) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (सहन्तः) सोढारः (ऋञ्जत) प्रसाध्नुत (स्वरोचिषः) स्वयं रोची रोचनमेषान्ते (स्थारश्मानः) स्थिरा रश्मानः किरणा इव व्यवहारा येषान्ते (हिरण्ययाः) तेजोमयाः (स्वायुधासः) स्वकीयान्यायुधानि येषान्ते (इष्मिणः) बहुविधमिष्मेच्छा येषान्ते ॥५॥
अन्वय : हे मनुष्या ! स वः स्वनो नाऽमवान् वृषा त्वेषस्तविषो ययिरेवयामरुत् व्यवहारान् रेजयत् येना सहन्तः स्वरोचिषः स्थारश्मानो हिरण्ययाः स्वायुधास इष्मिणो जना यूयं स्वप्रयोजनान्यृञ्जत ॥५॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः । ये प्रकाशितधर्म्यव्यवहारा शमदमान्वितास्तेजस्विनो बलिष्ठा युद्धविद्याकुशलाः स्युस्त एव विजयिनो भवन्ति ॥५॥