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Rigveda / 6 / 1 / 3

वृ॒तेव॒ यन्तं॑ ब॒हुभि॑र्वस॒व्यै॒३॒॑स्त्वे र॒यिं जा॑गृ॒वांसो॒ अनु॑ ग्मन्। रुश॑न्तम॒ग्निं द॑र्श॒तं बृ॒हन्तं॑ व॒पाव॑न्तं वि॒श्वहा॑ दीदि॒वांस॑म् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 1 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वान् जन क्या जानें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वृ॒ताऽइ॑व। यन्त॑म्। ब॒हुऽभिः॑। व॒स॒व्यैः॑। त्वे इति॑। र॒यिम्। जा॒गृ॒ऽवांसः॑। अनु॑। ग्म॒न्। रुश॑न्तम्। अ॒ग्निम्। द॒र्श॒तम्। बृ॒हन्त॑म्। व॒पाऽव॑न्तम्। वि॒श्वहा॑। दी॒दि॒ऽवांस॑म् ॥३॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (जागृवांसः) विद्या से जागृत विद्वान् जन जिसको (बहुभिः) बहुत (वसव्यैः) पृथिवी आदिकों में हुए पदार्थों के साथ (वृतेव) वर्त्तमान होते हैं, जिसमें उस मार्ग से (यन्तम्) जाते (रुशन्तम्) हिंसा करते (दर्शतम्) देखनेवाले वा देखने योग्य (बृहन्तम्) बड़े (वपावन्तम्) बहुत कार्य्यों के संस्कार जमाने के अधिकरण विद्यमान जिसमें उस (विश्वहा) सब दिनों वा सब दिनों की (दीदिवांसम्) प्रकाशमान वा प्रकाश करते हुए (अग्निम्) अग्नि के सदृश विद्यादिरूप के (अनु ग्मन्) पीछे चलते हैं और जो (त्वे) आप में (रयिम्) धन को धारण करे, उसको आप पश्चात् जानिये ॥३॥

भावार्थ : जो निरन्तर सर्वत्र चलते हुए सब के प्रकाशक और सम्पूर्ण पदार्थों में व्यापक और पदार्थों के जलानेवाले बिजुली आदि स्वरूप अग्नि को जानकर कार्य्यों में उपयुक्त करते हैं, वे अत्यन्त लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं ॥३॥