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Rigveda / 6 / 1 / 6

स॒प॒र्येण्यः॒ स प्रि॒यो वि॒क्ष्व१॒॑ग्निर्होता॑ म॒न्द्रो नि ष॑सादा॒ यजी॑यान्। तं त्वा॑ व॒यं दम॒ आ दी॑दि॒वांस॒मुप॑ ज्ञु॒बाधो॒ नम॑सा सदेम ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 1 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को किसकी सेवा करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒प॒र्येण्यः॑। सः। प्रि॒यः। वि॒क्षु। अ॒ग्निः। होता॑। म॒न्द्रः। नि। स॒सा॒द॒। यजी॑यान्। तम्। त्वा॒। व॒यम्। दमे॑। आ। दी॒दि॒ऽवांस॑म्। उप॑। ज्ञु॒ऽबाधः॑। नम॑सा। स॒दे॒म॒ ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वान् ! जो (विक्षु) प्रजाओं में (सपर्य्येण्यः) सेवा करने योग्य और (प्रियः) कामना करने योग्य अर्थात् सुन्दर (होता) ग्रहण करने और (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (यजीयान्) अतिशय यज्ञकर्त्ता (अग्निः) अग्नि (नि) अत्यन्त (ससादा) स्थित होता है जिन आप से (सः) वह प्रयोग किया जाता है (तम्) उस (दमे) गृह में (दीदिवांसम्) प्रकाशमान (त्वा)आपको (ज्ञुबाधः) जंघाओं को बाधते हुए (वयम्) हम लोग (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (उप, आ, सदेम) समीप होवें ॥६॥

भावार्थ : जो अग्नि आदि की विद्या को जानते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥