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Rigveda / 6 / 1 / 12

नृ॒वद्व॑सो॒ सद॒मिद्धे॑ह्य॒स्मे भूरि॑ तो॒काय॒ तन॑याय प॒श्वः। पू॒र्वीरिषो॑ बृह॒तीरा॒रेअ॑घा अ॒स्मे भ॒द्रा सौ॑श्रव॒सानि॑ सन्तु ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 1 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वज्जन क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : नृ॒ऽवत्। व॒सो॒ इति॑। सद॑म्। इत्। धे॒हि॒। अ॒स्मे इति॑। भूरि॑। तो॒काय॑। तन॑याय। प॒श्वः। पू॒र्वीः। इषः॑। बृ॒ह॒तीः। आ॒रेऽअ॑घाः। अ॒स्मे इति॑। भ॒द्रा। सौ॒श्र॒व॒सानि॑। स॒न्तु॒ ॥१२॥

पदार्थ : हे (वसो) वसनेवाले विद्वज्जन ! आप (अस्मे) हम लोगों में (तोकाय) कन्या और (तनयाय) पुत्र के लिये (पश्वः) पशु गौ आदि को तथा (सदम्) वर्त्तमान होते हैं जिसमें उस गृह और (बृहतीः) बड़ी (पूर्वीः) प्राचीन (आरेअघाः) दूर पाप जिनके उन (इषः) अन्न आदि सामग्रियों को (भूरि) बहुत (धेहि) धारण करिये जिससे (अस्मे) हम लोगों के लिये (इत्) ही (नृवत्) मनुष्यों के सदृश (भद्रा) कल्याणकारक (सौश्रवसानि) उत्तम प्रकार संस्कार से युक्त अन्न में हुए पदार्थ (सन्तु) हों ॥१२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् हैं, जो मातापिताओं के समान सांसारिक जनों के लिये हितकारक वस्तुओं को देते हैं ॥१२॥