Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 2 / 2

त्वां हि ष्मा॑ चर्ष॒णयो॑ य॒ज्ञेभि॑र्गी॒र्भिरीळ॑ते। त्वां वा॒जी या॑त्यवृ॒को र॑ज॒स्तूर्वि॒श्वच॑र्षणिः ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 2 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : विद्वानों को इस संसार में कैसा वर्त्ताव करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वाम्। हि। स्म॒। च॒र्ष॒णयः॑। य॒ज्ञेभिः॑। गीः॒ऽभिः। ईळ॑ते। त्वाम्। वा॒जी। या॒ति॒। अ॒वृ॒कः। र॒जः॒ऽतूः। वि॒श्वऽच॑र्षणिः ॥२॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जो (चर्षणयः) मनुष्य (यज्ञेभिः) अध्ययन-अध्यापन आदिकों और (गीर्भिः) वाणियों से (त्वाम्) आपकी (हि) निश्चित (ईळते) स्तुति करते (स्मा) ही हैं (रजस्तूः) लोकों का बढ़ानेवाला (विश्वचर्षणिः) सम्पूर्ण विचारशील मनुष्य जिसके वह (अवृकः) चोर आदिकों के सङ्ग से रहित (वाजी) वेग से युक्त हुआ (त्वाम्) आपको (याति) प्राप्त होता है ॥२॥

भावार्थ : जो मनुष्य जिस विद्वान् का सेवन करते हैं, वह उनके लिये विद्या देवे ॥२॥