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Rigveda / 6 / 2 / 6

त्वे॒षस्ते॑ धू॒म ऋ॑ण्वति दि॒वि षञ्छु॒क्र आत॑तः। सूरो॒ न हि द्यु॒ता त्वं कृ॒पा पा॑वक॒ रोच॑से ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 2 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वे॒षः। ते॒। धू॒मः। ऋ॒ण्व॒ति॒। दि॒वि। सन्। शु॒क्रः। आऽत॑तः। सूरः॑। न। हि। द्यु॒ता। त्वम्। कृ॒पा। पा॒व॒क॒। रोच॑से ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (ते)उसका (सूरः) सूर्य्य (न) जैसे वैसे (त्वेषः) प्रदीप्त (धूमः) धूम (शुक्रः) शुद्धि का करनेवाला (आततः) व्याप्त (सन्) होता हुआ (दिवि) प्रकाश में (ऋण्वति) चलता है, वैसे (हि) ही (त्वम्) आप (द्युता) प्रकाश और (कृपा) कृपा से (पावक) अग्नि के सदृश वर्त्तमान हुए (रोचसे) प्रकाशित होते हो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे विद्वान् जनो ! जिस अग्नि के धूम से वायु आदि पदार्थ शुद्ध होते हैं और जो सूर्य्य आदि का कारण है, उसकी विद्या को प्राप्त होकर उत्तम गुणों में आप लोग प्रकाशित हूजिये ॥६॥