Rigveda / 6 / 2 / 8
क्रत्वा॒ हि द्रोणे॑ अ॒ज्यसेऽग्ने॑ वा॒जी न कृत्व्यः॑। परि॑ज्मेव स्व॒धा गयोऽत्यो॒ न ह्वा॒र्यः शिशुः॑ ॥८॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 2 | Mantra No : 8
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : agniH | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : kratvaa hi droNe ajyase.agne vaajii na kRRitvyaH. parijmeva svadhaa gayo.atyo na hvaaryaH shishuH .8.
Component Words : kratvaa. hi. droNe. ajyase. agne. vaajii. na. kRRitvyaH. parijmaa.aiva. svadhaa. gayaH. atyaH. na. hvaaryaH. shishuH .8.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : फिर विद्वान् को क्या करना चाहिये विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : क्रत्वा॑। हि। द्रोणे॑। अ॒ज्यसे॑। अग्ने॑। वा॒जी। न। कृत्व्यः॑। परि॑ज्माऽइव। स्व॒धा। गयः॑। अत्यः॑। न। ह्वा॒र्यः। शिशुः॑ ॥८॥
पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान प्रतापी जन आप (हि) जिस कारण (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से (वाजी) वेग से युक्त (न) जैसे वैसे (कृत्व्यः) करने योग्य कर्म्म को (परिज्मेव) सब ओर जानेवाला वह वायु (स्वधा) अन्न (गयः) गृह और (अत्यः) मार्ग को व्याप्त होनेवाला (न) जैसे वैसे (ह्वार्य्यः) कुटिल मार्ग में जाने योग्य (शिशुः) बालक (द्रोणे) जाने योग्य मार्ग में (अज्यसे) प्राप्त किये जाते हो, इस कारण से कृतकृत्य हो ॥८॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सम्पूर्ण अज्ञ जनों के लिये बुद्धि देकर श्रेष्ठ मार्ग में प्राप्त कराते हैं और माता-पिता बालक को जैसे वैसे शिक्षा करते हैं, वे अन्न आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय : पुनर्विदुषा किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
पदपाठ : क्रत्वा॑। हि। द्रोणे॑। अ॒ज्यसे॑। अग्ने॑। वा॒जी। न। कृत्व्यः॑। परि॑ज्माऽइव। स्व॒धा। गयः॑। अत्यः॑। न। ह्वा॒र्यः। शिशुः॑ ॥८॥
पदार्थ : (क्रत्वा) प्रज्ञया कर्म्मणा वा (हि) यतः (द्रोणे) गन्तव्ये मार्गे (अज्यसे) गम्यसे (अग्ने) पावक इव वर्त्तमान (वाजी) वेगवान् (न) इव (कृत्व्यः) करणीयं कर्म्म। कृत्त्वीति कर्मनाम। (निघं०२.१) (परिज्मेव) यः परितः सर्वतो गच्छति स वायुः (स्वधा) अन्नम् (गयः) गृहम् (अत्यः) अतति व्याप्नोत्यध्वानम् (न) इव (ह्वार्य्यः) कुटिलं मार्गं गन्तुं योग्यः (शिशुः) बालकः ॥८॥
अन्वय : हे अग्ने ! त्वं हि क्रत्वा वाजी न कृत्व्यः परिज्मेव स्वधा गयोऽत्यो न ह्वार्यः शिशुर्द्रोणेऽज्यसे तस्मात् कृतकृत्योऽसि ॥८॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः । ये विद्वांसः सर्वाज्ञजनेभ्यो बुद्धिं प्रदाय सन्मार्गं नयन्ति मातापितरौ बालमिव शिक्षयन्ति त अन्नादिना सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥८॥