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Rigveda / 1 / 36 / 18

अ॒ग्निना॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ परा॒वत॑ उ॒ग्रादे॑वं हवामहे । अ॒ग्निर्न॑य॒न्नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं तु॒र्वीतिं॒ दस्य॑वे॒ सहः॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 36 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : अग्निः | छन्द : विष्टारपङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : सब मनुष्य सभाध्यक्ष से मिलके दुष्टों को कैसे मारें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अ॒ग्निना॑ । तु॒र्वश॑म् । यदु॑म् । प॒रा॒ऽवतः॑ । उ॒ग्रऽदे॑वम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । अ॒ग्निः । न॒य॒त् । नव॑ऽवास्त्वम् । बृ॒हत्ऽर॑थम् । तु॒र्वीति॑म् । दस्य॑वे । सहः॑॥

पदार्थ : हम लोग जिस (अग्निना) अग्नि के समान तेजस्वी सभाध्यक्ष राजा के साथ मिलके (उग्रादेवम्) तेज स्वभाव वालों को जीतने की इच्छा करने तथा (तुर्वशम्) शीघ्र ही दूसरे के पदार्थों को ग्रहण करनेवाले (यदुम्) दूसरे का धन मारने के लिये यत्न करते हुए डांकू पुरुष को (परावतः) दूसरे देश से (हवामहे) युद्ध के लिये बुलावें वह (दस्यवे) अपने विशेष बल से दूसरे का पदार्थ हरनेवाले डांकू का (सहः) तिरस्कार करने योग्य बल को (अग्निः) सब मुख्य राजा (नववास्त्वम्) एकान्त में नवीन घर बनाने (बृहद्रथम्) बड़े-२ रमण के साधन रथोंवाले (तुर्वीतिम्) हिंसक दुष्टपुरुषों को यहां (नयत्) कैद में रक्खें ॥१८॥

भावार्थ : सब धार्मिक पुरुषों को चाहिये की तेजस्वी सभाध्यक्ष राजा के साथ मिल के वेग से अन्य के पदार्थों को हरने खोटे स्वभावयुक्त और अपने विजय की इच्छा करनेवाले डाकुओं को बुला उनके पर्वतादि एकान्त स्थानों में बने हुए घरों को खसाकर और बांध के उनको कैद में रक्खें ॥१८॥ सायणाचार्य ने यह मन्त्र नवीन पुराण मिथ्या ग्रन्थों की रीति के अवलंब से भ्रम के साथ कुछ का कुछ विरुद्ध वर्णन किया है ॥