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Rigveda / 6 / 8 / 4

अ॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षा अ॑गृभ्णत॒ विशो॒ राजा॑न॒मुप॑ तस्थुर्ऋ॒ग्मिय॑म्। आ दू॒तो अ॒ग्निम॑भरद्वि॒वस्व॑तो वैश्वान॒रं मा॑त॒रिश्वा॑ परा॒वतः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 8 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह वायु कैसा है और क्या करता है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒पाम्। उ॒पऽस्थे॑। म॒हि॒षाः। अ॒गृ॒भ्ण॒त॒। विशः॑। राजा॑नम्। उप॑। त॒स्थुः॒। ऋ॒ग्मिय॑म्। आ। दू॒तः। अ॒ग्निम्। अ॒भ॒र॒त्। वि॒वस्व॑तः। वै॒श्वा॒न॒रम्। मा॒त॒रिश्वा॑। प॒रा॒ऽवतः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे विद्वान् जनो ! जो (दूतः) सन्तापित करानेवाला (मातरिश्वा) अन्तरिक्ष में शयन करनेवाला वायु (परावतः) दूर स्थित (विवस्वतः) सूर्य्य के (वैश्वानरम्) सर्वत्र प्रकाशमान (अग्निम्) अग्नि को (अभरत्) धारण करता और जिस (ऋग्मियम्) ऋचाओं द्वारा प्रमाण किया जाता उस (राजानम्) जैसे राजा का, वैसे सूर्य को (विशः) प्रजायें (उप) समीप में (आ) चारों ओर से (तस्थुः) प्राप्त होती हैं, वैसे सूर्य्य उपस्थित होता है और जिस (अपाम्) प्राणों वा जलों के (उपस्थे) समीप में वर्त्तमान का (महिषाः) बड़े जन (अगृभ्णत) ग्रहण करते हैं, उस वायु को आप लोग जानिये ॥४॥

भावार्थ : जैसे वायु दूर वर्त्तमान भी सूर्य्य के तेज को धारण करता है, वैसे उत्तम राजा दूर स्थित भी प्रजाओं का पोषण करे ॥४॥