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Rigveda / 6 / 8 / 6

अ॒स्माक॑मग्ने म॒घव॑त्सु धार॒याऽना॑मि क्ष॒त्रम॒जरं॑ सु॒वीर्य॑म्। व॒यं ज॑येम श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॒ वैश्वा॑नर॒ वाज॑मग्ने॒ तवो॒तिभिः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 8 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒स्माक॑म्। अ॒ग्ने॒। म॒घव॑त्ऽसु। धा॒र॒य॒। अना॑मि। क्ष॒त्रम्। अ॒जर॑म्। सु॒ऽवीर्य॑म्। व॒यम्। ज॒ये॒म॒। श॒तिन॑म्। स॒ह॒स्रिण॑म्। वैश्वा॑नर। वाज॑म्। अ॒ग्ने॒। तव॑। ऊ॒तिऽभिः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे (वैश्वानर) संसार के अग्रणी (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्वन् राजन् ! (वयम्) हम लोग (तव) आपकी (ऊतिभिः) रक्षा आदि के साथ (शतिनम्) सैकड़ों प्रकार से योद्धाओं से और (सहस्रिणम्) सहस्रों योद्धाओं से संयुक्त (वाजम्) संग्राम को (जयेम) जीतें । तथा हे (अग्ने) तेजस्विन् ! जैसे (अस्माकम्) हम लोगों के (मघवत्सु) बहुत धनों से युक्त प्रजाजनों में (सुवीर्य्यम्) उत्तम बल (अजरम्) नाशरहित (क्षत्रम्) राज्य वा धन (अनामि) नम्र होवे वैसा (धारय) धारण करो ॥६॥

भावार्थ : जो राजा और सेना के अध्यक्ष धार्मिक, विद्वान्, न्यायकारी और जितेन्द्रिय हों तो उनका सर्वत्र विजय होता है ॥६॥