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Rigveda / 6 / 13 / 5

ता नृभ्य॒ आ सौ॑श्रव॒सा सु॒वीराग्ने॑ सूनो सहसः पु॒ष्यसे॑ धाः। कृ॒णोषि॒ यच्छव॑सा॒ भूरि॑ प॒श्वो वयो॒ वृका॑या॒रये॒ जसु॑रये ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 13 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ता। नृऽभ्यः॑। आ। सौ॒श्र॒व॒सा। सु॒ऽवीरा॑। अग्ने॑। सू॒नो॒ इति॑। स॒ह॒सः॒। पु॒ष्यसे॑। धाः॒। कृ॒णोषि॑। यत्। शव॑सा। भूरि॑। प॒श्वः। वयः॑। वृका॑य। अ॒रये॑। जसु॑रये ॥५॥

पदार्थ : हे (सहसः) बल के सम्बन्ध में (सूनो) बलवान् सन्तान (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान आप (यत्) जिस (शवसा) बल से (पुष्यसे) पुष्टि के लिये (नृभ्यः) नायक जनों से (सुवीरा) सुन्दर वीर जिनके लिये (ता) उन (सौश्रवसा) विद्वान् से सिद्ध किये नये कर्म्मों को (आ, धाः) धारण करते (पश्वः) पशु के (भूरि) बड़े (वयः) जीवन को (कृणोषि) करते हो और (जसुरये) हिंसा करनेवाले (वृकाय) वृक के सदृश वर्त्तमान (अरये) शत्रु के लिये दण्ड देते हो, इस कारण से आप न्यायकारी हो ॥५॥

भावार्थ : जो राजा दुष्ट चोरादिकों का निवारण करके प्रजाओं को पुष्ट करता है, वह सब का हितैषी होता है ॥५॥