Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 15 / 6

अ॒ग्निम॑ग्निं वः स॒मिधा॑ दुवस्यत प्रि॒यंप्रि॑यं वो॒ अति॑थिं गृणी॒षणि॑। उप॑ वो गी॒र्भिर॒मृतं॑ विवासत दे॒वो दे॒वेषु॒ वन॑ते॒ हि वार्यं॑ दे॒वो दे॒वेषु॒ वन॑ते॒ हि नो॒ दुवः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 15 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदतिशक्वरी | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒ग्निम्ऽअ॑ग्निम्। वः॒। स॒म्ऽइधा॑। दु॒व॒स्य॒त॒। प्रि॒यम्ऽप्रि॑यम्। वः॒। अति॑थिम्। गृ॒णी॒षणि॑। उप॑। वः॒। गीः॒ऽभिः। अ॒मृत॑म्। वि॒वा॒स॒त॒। दे॒वः। दे॒वेषु॑। वन॑ते। हि। वार्य॑म्। दे॒वः। दे॒वेषु॑। वन॑ते। हि। नः॒। दुवः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (गृणीषणि) स्तुति करने योग्य व्यवहार में (समिधा) इन्धनों से (वः) आप लोगों के (अग्निमग्निम्) अग्नि अग्नि का और (वः) आप लोगों के (प्रियम्प्रियम्) कामना करने योग्य कामना करने योग्य (अतिथिम्) अतिथि का (उप, वनते) समीप में सेवन करता (हि) ही है और जो (देवेषु) श्रेष्ठ गुणयुक्तों में (देवः) प्रकाशमान (गीर्भिः) वाणियों से (वः) आप लोगों को (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य व्यवहार (अमृतम्) कारणरूप से नाशरहित का सेवन करता है और जो (हि) निश्चित (देवेषु) पितृरूप विद्वानों में (देवः) दाता जन (नः) हम लोगों के लिये (दुवः) सेवन को (वनते) स्वीकार करता है उसका (दुवस्यत) सेवन करो उसका (विवासत) सेवन करो ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे विद्वान् का, वैसे अग्नि का भी मेल करावें, जिससे अभीष्ट कार्य्य सिद्ध होवे ॥६॥