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Rigveda / 6 / 15 / 15

अ॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॑तानि॒ हि ख्यो नि त्वा॑ दधीत॒ रोद॑सी॒ यज॑ध्यै। अवा॑ नो मघव॒न्वाज॑साता॒वग्ने॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता त॑रेम॒ ता त॑रेम॒ तवाव॑सा तरेम ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 15 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : ब्राह्मीबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒भि। प्रयां॑सि। सुऽधि॑तानि। हि। ख्यः। नि। त्वा॒। द॒धी॒त॒। रोद॑सी॒ इति॑। यज॑ध्यै। अव॑। नः॒। म॒घ॒ऽव॒न्। वाज॑ऽसातौ॑। अग्ने॑। विश्वा॑नि। दुः॒ऽइ॒ता। त॒रे॒म॒। ता। त॒रे॒म॒। तव॑। अव॑सा। त॒रे॒म॒ ॥१५॥

पदार्थ : हे (मघवन्) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (अग्ने) अतितेजस्वी ! जो आप (सुधितानि) उत्तम प्रकार तृप्ति करनेवाले (प्रयांसि) कामना करने योग्य अन्न आदि वस्तुओं को (हि) निश्चित (नि, दधीत) अच्छे प्रकार धारण करें और आप विज्ञानों को (अभि, ख्यः) सम्मुख कहते हो और आप (यजध्यै) मेल करने को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को धारण करिये तथा (वाजसातौ) संग्राम में (नः) हम लोगों की (अवा) रक्षा करिये जिन (त्वा) आप का आश्रय करके हम लोग (ता) उन (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरिता) दुःख के प्राप्त करानेवाले पापों का (तरेम) उल्लङ्घन करें (तव) आपके (अवसा) रक्षण आदि से (तरेम) दुःखसागर के पार जावें और निरन्तर (तरेम) सम्पूर्ण दोषों का त्याग करें ॥१५॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अन्न और पानादिक जीवन के हितकारक पदार्थों को धारण करता, अन्तर्यामी होने से सत्य का उपदेश करता, उसके आश्रय से ही सम्पूर्ण दुःखों के पार प्राप्त होओ ॥१५॥