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Rigveda / 6 / 16 / 6

त्वं दू॒तो अम॑र्त्य॒ आ व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॑म्। शृ॒ण्वन् विप्र॑स्य सुष्टु॒तिम् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 16 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : आर्च्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। दू॒तः। अम॑र्त्यः। आ। व॒ह॒। दैव्य॑म्। जन॑म्। शृ॒ण्वन्। विप्र॑स्य। सु॒ऽस्तु॒तिम् ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (अमर्त्यः) साधारण मनुष्यों के स्वभाव से विरुद्ध (दूतः) सम्पूर्ण पदार्थविद्याओं के समाचार के जनानेवाले (त्वम्) आप (विप्रस्य) बुद्धिमान् की (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा को (शृण्वन्) सुनते हुए (दैव्यम्) विद्वानों से सिद्ध किये गये विद्वान् (जनम्) जन को (आ, वहा) सब प्रकार से प्राप्त कराइये ॥६॥

भावार्थ : हे परीक्षा करनेवाले ! आप लोग पक्षपात का त्याग करके विद्यार्थियों की यथावत् परीक्षा करके विद्यायुक्त कीजिये ॥६॥