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Rigveda / 6 / 17 / 2

स ईं॑ पाहि॒ य ऋ॑जी॒षी तरु॑त्रो॒ यः शिप्र॑वान्वृष॒भो यो म॑ती॒नाम्। यो गो॑त्र॒भिद्व॑ज्र॒भृद्यो ह॑रि॒ष्ठाः स इ॑न्द्र चि॒त्राँ अ॒भि तृ॑न्धि॒ वाजा॑न् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 17 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। ई॒म्। पा॒हि॒। यः। ऋ॒जी॒षी। तरु॑त्रः। यः। शिप्र॑ऽवान्। वृ॒ष॒भः। यः। म॒ती॒नाम्। यः। गो॒त्र॒ऽभित्। व॒ज्र॒ऽभृत्। यः। ह॒रि॒ऽस्थाः। सः। इ॒न्द्र॒। चि॒त्रान्। अ॒भि। तृ॒न्धि॒। वाजा॑न् ॥२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दुष्टों के विदीर्ण करनेवाले ! (यः) जो (ऋजीषी) सरलस्वभाव (तरुत्रः) सम्पूर्ण दुःख से उत्तीर्ण हुए आप हैं (सः) वह आप (ईम्) प्राप्त वस्तु का (पाहि) पालन करिये और (यः) जो (शिप्रवान्) सुन्दर ठुड्डी और नासिकावाले (वृषभः) बलिष्ठ और (यः) जो (मतीनाम्) मनुष्यों के मध्य में बलिष्ठ (यः) जो (वज्रभृत्) वज्र को धारण करनेवाले (गोत्रभित्) गोत्र के नाश करनेवाले हैं (यः) जो (हरिष्ठाः) अतिशय हरनेवाले हैं (सः) वह आप (चित्रान्) अद्भुत (वाजान्) हिंसकों का (अभि, तृन्धि) सब ओर से नाश करिये ॥२॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो प्रजा के रक्षक, दुष्टों के हिंसक जन होवें, उनका आप सत्कार करिये ॥२॥