Rigveda / 6 / 17 / 13
ए॒वा ता विश्वा॑ चकृ॒वांस॒मिन्द्रं॑ म॒हामु॒ग्रम॑जु॒र्यं स॑हो॒दाम्। सु॒वीरं॑ त्वा स्वायु॒धं सु॒वज्र॒मा ब्रह्म॒ नव्य॒मव॑से ववृत्यात् ॥१३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 17 | Mantra No : 13
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : svaraaTpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : evaa taa vishvaa chakRRivaa.msamindra.m mahaamugramajurya.m sahodaam. suviira.m tvaa svaayudha.m suvajramaa brahma navyamavase vavRRityaat .13.
Component Words : eva. taa. vishvaa. chakRRi.avaa.msam. indram. mahaam. ugram. ajuryam. sahaH.adaam. su.aviiram. tvaa. su.aaayudham. su.avajram. aa. brahma. navyam. avase. vavRRityaat .13.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर राजा और प्रजाजन कैसा वर्त्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : ए॒व। ता। विश्वा॑। च॒कृ॒ऽवांस॑म्। इन्द्र॑म्। म॒हाम्। उ॒ग्रम्। अ॒जु॒र्यम्। स॒हः॒ऽदाम्। सु॒ऽवीर॑म्। त्वा॒। सु॒ऽआ॒यु॒धम्। सु॒ऽवज्र॑म्। आ। ब्रह्म॑। नव्य॑म्। अव॑से। व॒वृ॒त्या॒त् ॥१३॥
पदार्थ : हे राजन् ! जो (ता) उन (विश्वा) सम्पूर्णों को और (चकृवांसम्) करते हुए (महाम्) बड़े (उग्रम्) तेजस्वी (अजुर्य्यम्) नहीं जीर्ण हुए (सहोदाम्) बल के देनेवाले (स्वायुधम्) उत्तम शस्त्र के चलाने में चतुर (सुवज्रम्) प्रशस्त वज्ररूप अस्त्र के चलाने में समर्थ (सुवीरम्) उत्तमवीरों से युक्त (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले शत्रु के नाशक (त्वा) आपको (एवा) ही (अवसे) रक्षण आदि के लिये और न्याय करने के लिये (आ, ववृत्यात्) सब ओर से वर्त्ताव करे वह (नव्यम्) नवीनों में हुए (ब्रह्म) बड़े धन वा अन्न को बढ़ाने को समर्थ होवे ॥१३॥
भावार्थ : पिता के सदृश प्रजाओं के पालन, धनुर्वेद, राजनीति और युद्धविद्या में कुशल राजा की सब लोग वृद्धि करें और इन लोगों की यह राजा निरन्तर वृद्धि करे ॥१३॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुना राजप्रजाजनाः कथं वर्त्तेयुरित्याह ॥
पदपाठ : ए॒व। ता। विश्वा॑। च॒कृ॒ऽवांस॑म्। इन्द्र॑म्। म॒हाम्। उ॒ग्रम्। अ॒जु॒र्यम्। स॒हः॒ऽदाम्। सु॒ऽवीर॑म्। त्वा॒। सु॒ऽआ॒यु॒धम्। सु॒ऽवज्र॑म्। आ। ब्रह्म॑। नव्य॑म्। अव॑से। व॒वृ॒त्या॒त् ॥१३॥
पदार्थ : (एवा) (ता) तानि (विश्वा) सर्वाणि (चकृवांसम्) कुर्वन्तम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यवन्तं शत्रुविदारकं वा (महाम्) महान्तम् (उग्रम्) तेजस्विनम् (अजुर्य्यम्) अजीर्णम् (सहोदाम्) बलप्रदम् (सुवीरम्) उत्तमवीरावृतम् (त्वा) त्वाम् (स्वायुधम्) उत्तमायुधप्रक्षेपकुशलम् (सुवज्रम्) प्रशस्तवज्रास्त्रचालनसमर्थम् (आ) (ब्रह्म) महद्धनमन्नं वा (नव्यम्) नवेषु भवम् (अवसे) रक्षणाद्याय (ववृत्यात्) वर्त्तयेत् ॥१३॥
अन्वय : हे राजन् ! यस्ता विश्वा चकृवांसं महामुग्रमजुर्य्यं सहोदां स्वायुधं सुवज्रं सुवीरमिन्द्रं त्वैवाऽवसे न्यायकरणायाऽऽववृत्यात् स नव्यं ब्रह्म वर्धयितुं शक्नुयात् ॥१३॥
भावार्थ : पितृवत्प्रजापालकं धनुर्वेदराजनीतियुद्धविद्याकुशलं राजानं सर्वे वर्धयन्तु तथैतानयं राजा सततं वर्धयेत् ॥१३॥