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Rigveda / 1 / 37 / 15

अस्ति॒ हि ष्मा॒ मदा॑य वः॒ स्मसि॑ ष्मा व॒यमे॑षाम् । विश्वं॑ चि॒दायु॑र्जी॒वसे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 37 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : कण्वो घौरः | देवता : मरूतः | छन्द : पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वे वायु किस-२ प्रयोजन के लिये हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : अस्ति॑ । हि । स्म॒ । मदा॑य । वः॒ । स्मसि॑ । स्म॒ । व॒यम् । ए॒षा॒म् । विश्व॑म् । चि॒त् । आयुः॑ । जी॒वसे॑॥

पदार्थ : हे विद्वान् मनुष्यो ! (एषाम्) जानी हे विद्या जिन की उन पवनों के सकाश से (हि) जिस कारण (स्म) निश्चय करके (वः) तुम लोगों के (मदाय) आनन्दपूर्वक (जीवसे) जीने के लिये (विश्वम्) सब (आयुः) अवस्था है इसी प्रकार (वयम्) आप से उपदेश को प्राप्त हुए हम लोग (चित्) भी (स्मसि, स्म) निरन्तर होवें ॥१५॥

भावार्थ : जैसे योगाभ्यास करके प्राणविद्या और वायु के विकारों को ठीक-२ जाननेवाले पथ्यकारी विद्वान् लोग आनन्दपूर्वक सब आयु भोगते हैं वैसे अन्य मनुष्यों को भी करनी चाहिये कि उन विद्वानों के सकाश से उस वायु विद्या को जानके संपूर्ण आयु भोगें ॥१५॥ मोक्षमूलर की उक्ति है कि निश्चय करके यहां तुम्हारी प्रसन्नता पुष्कल है हम लोग सब दिन तुम्हारे भृत्य हैं जो भी हम संपूर्ण आयु भर जीते हैं- यह अशुद्ध है। क्योंकि यहां प्राणरूप वायु से जीवन होता है हम लोग इस विद्या को #जानते हैं इस प्रकार इस मन्त्र का अर्थ है ॥१५॥ इसी प्रकार कि जैसे यहां मोक्षमूलर साहेब ने अपनी कपोल कल्पना से मंत्रो के अर्थ विरुद्ध वर्णन किये हैं वैसे आगे भी इनकी उक्ति अन्यथा ही है ऐसा सबको जानना चाहिये। जब पक्षपात को छोड़ कर मेरे रचे हुए मन्त्रार्थ भाष्य वा मोक्षमूलरादिकों के कहे हुए की परीक्षा करके विवेचन करेंगे तब इनके किये हुए ग्रन्थों की अशुद्धि जान पड़ेगी बहुत को थोड़े ही लिखने से जान लेवें आगे। आगे अब बहुत लिखने से क्या है। इस सूक्त में अग्नि के प्रकाश करनेवाले सब चेष्टा बल और आयु के निमित्त वायु और उस वायु विद्या को जाननेवाले राज* प्रजा के विद्वानों के गुण वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह चौदहवां वर्ग और सैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३७॥#[सं० उ० के अनुसार ‘जाने’। सं०]*[ सं० वा० के अनुसार ‘राजा, प्रजा, अश्वों और विद्वानों। सं०]