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Rigveda / 6 / 18 / 6

स हि धी॒भिर्हव्यो॒ अस्त्यु॒ग्र ई॑शान॒कृन्म॑ह॒ति वृ॑त्र॒तूर्ये॑। स तो॒कसा॑ता॒ तन॑ये॒ स व॒ज्री वि॑तन्त॒साय्यो॑ अभवत्स॒मत्सु॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 18 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : ब्राह्म्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। हि। धी॒भिः। हव्यः॑। अस्ति॑। उ॒ग्रः। ई॒शा॒न॒ऽकृत्। म॒ह॒ति। वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑। सः। तो॒कऽसा॑ता। तन॑ये। सः। व॒ज्री। वि॒त॒न्त॒साय्यः॑। अ॒भ॒व॒त्। स॒मत्ऽसु॑ ॥६॥

पदार्थ : हे राजन् ! जैसे (सः) वह (धीभिः) ज्ञान व बुद्धियों से (हव्यः) ग्रहण करने योग्य (महति) बड़े (वृत्रतूर्य्ये) संग्राम में (ईशानकृत्) ईश्वरता करनेवालों को पुरुषार्थी करनेवाला (अस्ति) है और (सः) वह (तोकसाता) सन्तानों के विभाग होने में (तनये) पुत्र के लिये (उग्रः) तेजस्वी और (सः) वह (हि) ही (वितन्तसाय्यः) अत्यन्त विस्तार करने योग्य (वज्री) शस्त्र हैं बाहुओं में जिसके ऐसा (समत्सु) संग्रामों में (अभवत्) होता है, वैसे आप करिये ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि सब कर्म्मचारियों को योग्य सिद्ध करे, जिससे सर्वदा विजय होवे ॥६॥