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Rigveda / 6 / 20 / 6

प्र श्ये॒नो न म॑दि॒रमं॒शुम॑स्मै॒ शिरो॑ दा॒सस्य॒ नमु॑चेर्मथा॒यन्। प्राव॒न्नमीं॑ सा॒प्यं स॒सन्तं॑ पृ॒णग्रा॒या समि॒षा सं स्व॒स्ति ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 20 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजा को किसका निषेध करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। श्ये॒नः। न। म॒दि॒रम्। अं॒शुम्। अ॒स्मै॒। शिरः॑। दा॒सस्य॑। नमु॑चेः। म॒था॒यन्। प्र। आ॒व॒त्। नमी॑म्। सा॒प्यम्। स॒सन्त॑म्। पृ॒णक्। रा॒या। सम्। इ॒षा। सम्। स्व॒स्ति ॥६॥

पदार्थ : जो राजा (मदिरम्) मादक द्रव्य और (अंशुम्) वैद्यकविद्या की रीति से विभाग किये गये का सेवन करते हुए और (नमुचेः) नहीं त्याग करनेवाले (दासस्य) सेवक के (शिरः) मस्तक को (श्येनः) बाज पक्षी (न) जैसे वैसे (प्र, मथायन्) अत्यन्त मथन करता हुआ (अस्मै) इसके लिये कठिन शिष्य को (नमीम्) नम्र (साय्यम्) कर्म के अन्त करनेवाले को (ससन्तम्) सोते हुए को करके (प्र, आवत्) रक्षा करे और (राया) धन से (स्वस्ति) सुख को (सम्, पृणक्) उत्तम प्रकार पूर्ण करता है तथा (इषा) अन्न आदि से सुख को (सम्) अच्छे प्रकार पूर्ण करता है, वह सम्राट् होने के योग्य होवे ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजाओं का यह उचित कर्म है कि जो मादक द्रव्य का सेवन करें उनको अत्यन्त दण्ड देके, यथायोग्य सत्कार से अप्रमादियों का सत्कार करें, वे साम्राज्य करने को योग्य होवें ॥६॥