Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 20 / 9

स ईं॒ स्पृधो॑ वनते॒ अप्र॑तीतो॒ बिभ्र॒द्वज्रं॑ वृत्र॒हणं॒ गभ॑स्तौ। तिष्ठ॒द्धरी॒ अध्यस्ते॑व॒ गर्ते॑ वचो॒युजा॑ वहत॒ इन्द्र॑मृ॒ष्वम् ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 20 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। ई॒म्। स्पृधः॑। व॒न॒ते॒। अप्र॑तिऽइतः। बिभ्र॑त्। वज्र॑म्। वृ॒त्र॒ऽहन॑म्। गभ॑स्तौ। तिष्ठ॑त्। हरी॒ इति॑। अधि॑। अस्ता॑ऽइव। गर्ते॑। व॒चः॒ऽयुजा॑। व॒ह॒तः॒। इन्द्र॑म्। ऋ॒ष्वम् ॥९॥

पदार्थ : (सः) वह प्रताप से युक्त राजा (वृत्रहणम्) जिससे मेघ का नाश करता है उस (वज्रम्) वज्र को (गभस्तौ) किरण में सूर्य जैसे (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (अप्रतीतः) शत्रुओं से नहीं जाना गया (स्पृधः) स्पर्द्धा करते हैं जिनमें उनका और (ईम्) जल का (वनते) सेवन करता है और (हरी) घोड़े जैसे धारण और आकर्षण को, वैसे वा (अस्तेव) प्रेरणा करनेवाला सारथि जैसे वैसे (गर्ते) गृह में (अधि, तिष्ठत्) स्थित होता है, वैसे आप जो (वचोयुजा) वचन से युक्त करते वे दोनों (ऋष्वम्) बड़े (इन्द्रम्) बिजुली के सदृश राजा को (वहतः) पहुँचाते हैं, उनको वाहनों में युक्त करिये ॥९॥

भावार्थ : राजा सदा ही अपने विचार को छिपावे, जब कार्य सिद्ध होवे तभी लोग प्रकट जानें और शस्त्रों को धारण कर सेनाओं को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होवे ॥९॥