Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 6 / 21 / 7

अ॒भि त्वा॒ पाजो॑ र॒क्षसो॒ वि त॑स्थे॒ महि॑ जज्ञा॒नम॒भि तत्सु ति॑ष्ठ। तव॑ प्र॒त्नेन॒ युज्ये॑न॒ सख्या॒ वज्रे॑ण धृष्णो॒ अप॒ ता नु॑दस्व ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 21 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒भि। त्वा॒। पाजः॑। र॒क्षसः॑। वि। त॒स्थे॒। महि॑। ज॒ज्ञा॒नम्। अ॒भि। तत्। सु। ति॒ष्ठ॒। तव॑। प्र॒त्नेन॑। युज्ये॑न। सख्या॑। वज्रे॑ण। धृ॒ष्णो॒ इति॑। अप॑। ता। नु॒द॒स्व॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (धृष्णो) दृढ़ राजन् ! (तव) आपका जो (महि) बड़ा (जज्ञानम्) सुखजनक (पाजः) बल (रक्षसः) दुष्ट मनुष्यों के (अभि, वि, तस्थे) सम्मुख विशेषकर स्थित होता है (तत्) वह (त्वा) आपको प्राप्त होवे और आप उसके (अभि, सु तिष्ठ) सम्मुख स्थित हूजिये उस (प्रत्नेन) प्राचीन (युज्यते) युक्त करने के योग्य (सख्या) मित्र और (वज्रेण) शस्त्र और अस्त्रों के समूह से आप (ता) उन शत्रुसेनाओं को (अप, नुदस्व) दूर करिये ॥७॥

भावार्थ : हे राजजन ! जो राजपुरुष दुष्टों के लिये दण्ड देते और श्रेष्ठों को पालन करते हैं, उनका आप सत्कार करिये ॥७॥