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Rigveda / 6 / 21 / 9

प्रोतये॒ वरु॑णं मि॒त्रमिन्द्रं॑ म॒रुतः॑ कृ॒ष्वाव॑से नो अ॒द्य। प्र पू॒षणं॒ विष्णु॑म॒ग्निं पुरं॑धिं सवि॒तार॒मोष॑धीः॒ पर्व॑तांश्च ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 21 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। ऊ॒तये॑। वरु॑णम्। मि॒त्रम्। इन्द्र॑म्। म॒रुतः॑। कृ॒ष्व॒। अव॑से। नः॒। अ॒द्य। प्र। पू॒षण॑म्। विष्णु॑म्। अ॒ग्निम्। पुर॑म्ऽधि॑म्। स॒वि॒तार॑म्। ओष॑धीः। पर्व॑तान्। च॒ ॥९॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! आप (अद्य) इस समय (नः) हम लोगों को (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (वरुणम्) उदान और (मित्रम्) प्राण वायु (इन्द्रम्) बिजुली को (मरुतः) पवनों को (प्र, कृष्व) अच्छे प्रकार करिये और (अवसे) ज्ञान आदि के लिये (पूषणम्) पुष्टि करनेवाले समान वायु (विष्णुम्) व्यापक व्यान और धनञ्जय वायु को वा हिरण्गर्भ परमात्मा को और (अग्निम्) प्रसिद्ध अग्नि (पुरन्धिम्) सब को धारण करनेवाले सूत्रात्मा (सवितारम्) सूर्यमण्डल (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियों और (पर्वतान्, च) मेघों वा पर्वतों को (प्र) अच्छे प्रकार करिये ॥९॥

भावार्थ : हे विद्वान्जनो ! हम लोगों के लिये जैसे पृथिवी आदि पदार्थ सुखकारक होवें, वैसे करिये ॥९॥