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Rigveda / 6 / 22 / 6

अ॒या ह॒ त्यं मा॒यया॑ वावृधा॒नं म॑नो॒जुवा॑ स्वतवः॒ पर्व॑तेन। अच्यु॑ता चिद्वीळि॒ता स्वो॑जो रु॒जो वि दृ॒ळ्हा धृ॑ष॒ता वि॑रप्शिन् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 22 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर स्त्री और पुरुष परस्पर कैसे वर्ताव करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒या। ह॒। त्यम्। मा॒यया॑। व॒वृ॒धा॒नम्। म॒नः॒ऽजुवा॑। स्व॒ऽत॒वः॒। पर्व॑तेन। अच्यु॑ता। चि॒त्। वी॒ळि॒ता। सु॒ऽओ॒जः॒। रु॒जः। वि। दृ॒ळ्हा। धृ॒ष॒ता। वि॒ऽर॒प्शि॒न् ॥६॥

पदार्थ : हे (स्वतवः) अपना बल जिसके ऐसे (विरप्शिन्) महागुणों से युक्त (स्वोजः) उत्तम पराक्रमयुक्त प्रतापी आप (अया) इस (मायया) बुद्धि से जैसे वैसे स्त्री से रमण करिये वह स्त्री (वावृधानम्) बढ़े हुए (त्यम्) उस पति को प्राप्त होकर (मनोजुवा) मन के सदृश वेगयुक्त (पर्वतेन) मेघ से बिजुली जैसे वैसे रमण करे और ये दोनों (धृषता) ढीठपन से (रुजः) रोगों का नाश करके (ह) निश्चय से युक्त (अच्युता) अविनाशी से (वीळिता) स्तुतिरूप (वि) विशेष करके (दृळ्हा) दृढ़ (चिद्) भी कर्म्मों को करें ॥६॥

भावार्थ : हे स्त्री पुरुषो ! आप दोनों प्रेम से मिल के गृहाश्रम के कृत्यों में हर्ष से रोग निवृत्ति तथा प्रीति से मेल करके सन्तानों को उत्पन्न करो ॥६॥