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Rigveda / 6 / 24 / 6

वि त्वदापो॒ न पर्व॑तस्य पृ॒ष्ठादु॒क्थेभि॑रिन्द्रानयन्त य॒ज्ञैः। तं त्वा॒भिः सु॑ष्टु॒तिभि॑र्वा॒जय॑न्त आ॒जिं न ज॑ग्मुर्गिर्वाहो॒ अश्वाः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 24 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : ब्राह्मीबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। त्वत्। आपः॑। न। पर्व॑तस्य। पृ॒ष्ठात्। उ॒क्थेभिः॑। इ॒न्द्र॒। अ॒न॒य॒न्त॒। य॒ज्ञैः। तम्। त्वा॒। आ॒भिः। सु॒स्तु॒तिऽभिः॑। वा॒जय॑न्तः। आ॒जिम्। न। ज॒ग्मुः॒। गि॒र्वा॒हः॒। अश्वाः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) राजन् ! जो (त्वत्) आप से रक्षित हुए (पर्वतस्य) पर्वत के (पृष्ठात्) पीठ से (आपः) जल (न) जैसे वैसे (उक्थेभिः) प्रशंसा करने योग्य कर्मों के अनुष्ठानों से और (यज्ञैः) अच्छे कर्मों के अनुष्ठानों से जिन (त्वा) आपको (गिर्वाहः) वाणियों के प्राप्त करानेवाले (अश्वाः) बड़े विद्वान् जन (वि) विशेष करके (अनयन्त) पहुँचाते हैं (तम्) उन आपको (आभिः) इन प्रत्यक्ष (सुष्टुतिभिः) उत्तम स्तुतियों से (वाजयन्तः) प्रसन्न कराते हुए शूरवीर जन (आजिम्) सङ्ग्राम को (न) जैसे वैसे (जग्मुः) प्राप्त होवें ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन् ! जैसे पर्वत के ऊपर वर्त्तमान जल शीघ्र जाकर जलाशय को प्राप्त होता है, वैसे जो आपकी प्रजाओं के हित के चाहनेवाले जन आपको प्राप्त होते हैं, उनके सहित ही आप सदा उन्नत हूजिये ॥६॥