Rigveda / 6 / 25 / 7
अध॑ स्मा ते चर्ष॒णयो॒ यदेजा॒निन्द्र॑ त्रा॒तोत भ॑वा वरू॒ता। अ॒स्माका॑सो॒ ये नृत॑मासो अ॒र्य इन्द्र॑ सू॒रयो॑ दधि॒रे पु॒रो नः॑ ॥७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 25 | Mantra No : 7
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : adha smaa te charShaNayo yadejaanindra traatota bhavaa varuutaa. asmaakaaso ye nRRitamaaso arya indra suurayo dadhire puro naH .7.
Component Words : adha. sma. te. charShaNayaH. yat. ejaan. indra. traataa. uta. bhava. varuutaa. asmaakaasaH. ye. nRRi.atamaasaH. aryaH. indra. suurayaH. dadhire. puraH. naH .7.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अध॑। स्म॒। ते॒। च॒र्ष॒णयः॑। यत्। एजा॑न्। इन्द्र॑। त्रा॒ता। उ॒त। भ॒व॒। व॒रू॒ता। अ॒स्माका॑सः। ये। नृऽत॑मासः। अ॒र्यः। इन्द्र॑। सू॒रयः॑। द॒धि॒रे। पु॒रः। नः॒ ॥७॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले राजन् ! (ये) जो (ते) आपके (अस्माकासः) हमारे (नृतमासः) अतिशय मुखिया और (सूरयः) विद्वान् जन (चर्षणयः) सम्पूर्ण व्यवहारों में चतुर मनुष्य (नः) हम लोगों के (पुरः) नगरों को (दधिरे) धारण करें और उनके (अर्यः) स्वामी होते हुए (अध) अनन्तर (त्राता) रक्षा करनेवाले (भव) हूजिये ओर हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करनेवाले ! (यत्) जिससे आप (एजान्) भयभीतों को कम्पानेवाले करिये और (उत) भी (वरूता) श्रेष्ठ (स्मा) ही हूजिये ॥७॥
भावार्थ : हे राजन् ! विश्वासयुक्त, कुलीन, मुख्य राज्य में हुए जनों को इस राज्य और सेना के मध्य में रक्षा के निमित्त नियुक्त करिये और उनकी रक्षा निरन्तर करिये ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुना राजा किं कुर्यादित्याह ॥
पदपाठ : अध॑। स्म॒। ते॒। च॒र्ष॒णयः॑। यत्। एजा॑न्। इन्द्र॑। त्रा॒ता। उ॒त। भ॒व॒। व॒रू॒ता। अ॒स्माका॑सः। ये। नृऽत॑मासः। अ॒र्यः। इन्द्र॑। सू॒रयः॑। द॒धि॒रे। पु॒रः। नः॒ ॥७॥
पदार्थ : (अध) अनन्तरम् (स्मा) एव। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (ते) तव (चर्षणयः) सर्वव्यवहारविचक्षणा मनुष्याः (यत्) (एजान्) भीरून् कम्पकान् (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद राजन् (त्राता) रक्षकः (उत) अपि (भव) अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (वरूता) श्रेष्ठः (अस्माकासः) अस्मदीयाः (ये) (नृतमासः) अतिशयेन नायकाः (अर्यः) ईश्वरो वा स्वामी (इन्द्र) दुष्टानां विदारक (सूरयः) विपश्चितः (दधिरे) दधतु (पुरः) नगराणि (नः) अस्माकम् ॥७॥
अन्वय : हे इन्द्र ! ये तेऽस्माकासो नृतमासः सूरयश्चर्षणयो नः पुरो दधिरे तेषामर्यः सन्नध त्राता भव। हे इन्द्र ! यत्त्वमेजान् कुर्या उत वरूता स्मा भव ॥७॥
भावार्थ : हे राजन् ! विश्वस्तान् कुलीनान् मूलराज्ये भवानस्य राष्ट्रस्य सेनायाश्च मध्ये रक्षायै युञ्जीयाः तेषां रक्षां सततं कुर्याः ॥७॥