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Rigveda / 6 / 26 / 6

त्वं श्र॒द्धाभि॑र्मन्दसा॒नः सोमै॑र्द॒भीत॑ये॒ चुमु॑रिमिन्द्र सिष्वप्। त्वं र॒जिं पिठी॑नसे दश॒स्यन्ष॒ष्टिं स॒हस्रा॒ शच्या॒ सचा॑हन् ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 26 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। श्र॒द्धाभिः॑। म॒न्द॒सा॒नः। सोमैः॑। द॒भीत॑ये। चुमु॑रिम्। इ॒न्द्र॒। सि॒स्व॒प्। त्वम्। र॒जिम्। पिठी॑नसे। द॒श॒स्यन्। ष॒ष्टिम्। स॒हस्रा॑। शच्या॑। सचा॑। अ॒ह॒न् ॥६॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) राजन् ! (त्वम्) आप (श्रद्धाभिः) सत्य की धारणाओं से और (सोमैः) ऐश्वर्यों से (मन्दसानः) आनन्द करते हुए (दभीतये) दुःख के नाश के लिये (चुमुरिम्) भोजन करनेवाले को (सिष्वप्) सुलाइये और (त्वम्) आप (शच्या) बुद्धि वा कर्म के (सचा) साथ (पिठीनसे) पिठी के सदृश नासिका जिसकी उसके लिये (रजिम्) पङ्क्ति (षष्टिम्) साठ (सहस्रा) हजार (दशस्यन्) देता हुआ जैसे सूर्य मेघ का (अहन्) नाश करता है, वैसे शत्रुओं का हनन कीजिये ॥६॥

भावार्थ : हे राजन् ! सदा ही पूर्ण प्रीति और न्याय से प्रजापालन करो और हजारों धार्मिक विद्वानों को अधिकारों में स्थापित करके यश बढ़ाओ ॥६॥