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Rigveda / 6 / 27 / 1

किम॑स्य॒ मदे॒ किम्व॑स्य पी॒ताविन्द्रः॒ किम॑स्य स॒ख्ये च॑कार। रणा॑ वा॒ ये नि॒षदि॒ किं ते अ॑स्य पु॒रा वि॑विद्रे॒ किमु॒ नूत॑नासः ॥१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 27 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब आठ ऋचावाले सत्ताईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में प्रश्नों को कहते हैं ॥

पदपाठ : किम्। अ॒स्य॒। मदे॑। किम्। ऊँ॒ इति॑। अ॒स्य॒। पी॒तौ। इन्द्रः॑। किम्। अ॒स्य॒। स॒ख्ये। च॒का॒र॒। रणाः॑। वा॒। ये। नि॒ऽसदि॑। किम्। ते। अ॒स्य॒। पु॒रा। वि॒वि॒द्रे॒। किम्। ऊँ॒ इति॑। नूत॑नासः ॥१॥

पदार्थ : हे वैद्यराज ! (इन्द्रः) दुःख के नाश करनेवाले ने (अस्य) इसके (मदे) आनन्द में (किम्) क्या (चकार) किया (अस्य) इसके (पीतौ) पान करने में (किम्) क्या (उ) ही किया (अस्य) इसके (सख्ये) मित्रपने में क्या किया और (ये) जो (वा) वा (निषदि) बैठते हैं जिसमें उस गृह में (रणाः) रमते हुए (अस्य) इसके (पुरा) सम्मुख (किम्) क्या (विविद्रे) जानते हैं और (किम्) क्या (उ) और (नूतनासः) नवीन जन जानते हैं (ते) वे (किम्) क्या अनुष्ठान करते हैं ॥१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में सोमलताआदि के रस के पानविषयक प्रश्न हैं, उनके उत्तर अगले मन्त्र में जानने चाहिये ॥१॥