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Rigveda / 6 / 28 / 2

इन्द्रो॒ यज्व॑ने पृण॒ते च॑ शिक्ष॒त्युपेद्द॑दाति॒ न स्वं मु॑षायति। भूयो॑भूयो र॒यिमिद॑स्य व॒र्धय॒न्नभि॑न्ने खि॒ल्ये नि द॑धाति देव॒युम् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 28 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : गाव इन्द्रो वा | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रः॑। यज्व॑ने। पृ॒ण॒ते। च॒। शि॒क्ष॒ति॒। उप॑। इत्। द॒दा॒ति॒। न। स्वम्। मु॒षा॒य॒ति॒। भूयः॑ऽभूयः। र॒यिम्। इत्। अ॒स्य॒। व॒र्धय॑न्। अभि॑न्ने। खि॒ल्ये। नि। द॒धा॒ति॒। दे॒व॒ऽयुम् ॥२॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) राजा (अस्य) इस संसार के मध्य में (रयिम्) विद्यारूप धन को (इत्) (वर्धयन्) बढ़ाता हुआ (अभिन्ने) इकट्ठे हुए व्यवहार में और (खिल्ये) टुकड़ों में हुए के बीच (च) भी (देवयुम्) विद्वानों की कामना करते हुए विद्वान् को (भूयोभूयः) वारंवार (नि, दधाति) निरन्तर धारण करता है और (स्वम्) अपने ज्ञान को (न) नहीं (मुषायति) चुराता है और (यज्वने) यज्ञ के करनेवाले के लिये (उप, शिक्षति) विद्या देता है और (पृणते) सुखयुक्त करता है (च) और (ददाति) देता है, वह (इत्) ही सबको बढ़ा सकता है ॥२॥

भावार्थ : वे ही विद्वान् यथार्थवक्ता हैं, जो निष्कपटता से वार-वार प्रतिदिन विद्याकोश को योग्य के लिये देते हैं ॥२॥