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Rigveda / 6 / 28 / 5

गावो॒ भगो॒ गाव॒ इन्द्रो॑ मे अच्छा॒न् गावः॒ सोम॑स्य प्रथ॒मस्य॑ भ॒क्षः। इ॒मा या गावः॒ स ज॑नास॒ इन्द्र॑ इ॒च्छामीद्धृ॒दा मन॑सा चि॒दिन्द्र॑म् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 28 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : गावः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य विद्या की इच्छा करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : गावः॑। भगः॑। गावः॑। इन्द्रः॑। मे॒। अ॒च्छा॒न्। गावः॑। सोम॑स्य। प्र॒थ॒मस्य॑। भ॒क्षः। इ॒माः। याः। गावः॑। सः। ज॒ना॒सः॒। इन्द्रः॑। इ॒च्छामि॑। इत्। हृ॒दा। मन॑सा। चि॒त्। इन्द्र॑म् ॥५॥

पदार्थ : हे (जनासः) विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (प्रथमस्य) पहिले (सोमस्य) ऐश्वर्य की सेवनेवाली (गावः) गौएँ बछड़ों को दूध देती हैं, वैसे (गावः) किरणों के समान जन और (भगः) ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाला (गावः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों को और (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (भक्षः) सेवा करने योग्य जन (मे) मेरे लिये (अच्छान्) देवें और (याः) जो (इमाः) ये (गावः) वाणियाँ जिसकी हैं (सः) वह (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त मुझ को शिक्षा देवे और मैं (हृदा) आत्मा तथा (मनसा) विज्ञान से (चित्) भी (इन्द्रम्) ऐश्वर्ययुक्त जन की (इत्) ही (इच्छामि) इच्छा करता हूँ ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य आत्मा और अन्तःकरण से विद्या की प्राप्ति की इच्छा करते हैं, वे सब सुख का भोग करते हैं ॥५॥