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Rigveda / 6 / 38 / 4

वर्धा॒द्यं य॒ज्ञ उ॒त सोम॒ इन्द्रं॒ वर्धा॒द्ब्रह्म॒ गिर॑ उ॒क्था च॒ मन्म॑। वर्धाहै॑नमु॒षसो॒ याम॑न्न॒क्तोर्वर्धा॒न्मासाः॑ श॒रदो॒ द्याव॒ इन्द्र॑म् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 38 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब मनुष्य क्या बढ़ावें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वर्धा॑त्। यम्। य॒ज्ञः। उ॒त। सोमः॑। इन्द्र॑म्। वर्धा॑त्। ब्रह्म॑। गिरः॑। उ॒क्था। च॒। मन्म॑। वर्ध॑। अह॑। ए॒न॒म्। उ॒षसः॑। याम॑न्। अ॒क्तोः। वर्धा॑न्। मासाः॑। श॒रदः॑। द्यावः॑। इन्द्र॑म् ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यम्) जिस (इन्द्रम्) बिजुली आदि की विद्या को (यज्ञः) श्रेष्ठों की सङ्गति आदि स्वरूप और (उत) भी (सोमः) प्रेरणा करनेवाला विद्वान् (वर्धात्) बढ़ावे और (ब्रह्म) धन को (वर्धात्) बढ़ावे तथा (उक्था) प्रशंसा करने योग्य वचनों और (मन्म) विज्ञानों और (गिरः) वाणियों को (च) भी (वर्ध) बढ़ावे और (अह) इसके अनन्तर (एनम्) इस (उषसः) प्रभात से और (अक्तोः) रात्रि से (यामन्) चलते हैं जिसमें उस मार्ग में (मासाः) महीने (शरदः) ऋतुएँ और (द्यावः) प्रकाशयुक्त दिन वा प्रकाश (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य को (वर्धान्) बढ़ावें, वे हम लोगों को बढ़ावें ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे विद्वानों का सत्कार और सङ्गतिस्वरूप व्यवहार, बिजुली आदि की विद्या को तथा अत्यन्त ऐश्वर्य्य और पूर्ण आयु को बढ़ाता है, वैसे ही आप लोग सम्पूर्ण श्रेष्ठ व्यवहारों को दिनरात्रि बढ़ाइये ॥४॥