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Rigveda / 6 / 45 / 21

स नो॑ नि॒युद्भि॒रा पृ॑ण॒ कामं॒ वाजे॑भिर॒श्विभिः॑। गोम॑द्भिर्गोपते धृ॒षत् ॥२१॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 45 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर राजा और प्रजाजन परस्पर किसकी शोभा करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। नः॒। नि॒युत्ऽभिः॑। आ। पृ॒ण॒। काम॑म्। वाजे॑ऽभिः। अ॒श्विऽभिः॑। गोम॑त्ऽभिः। गो॒ऽप॒ते॒। धृ॒षत् ॥२१॥

पदार्थ : हे (गोपते) इन्द्रियों के स्वामिन् ! (सः) वह (धृषत्) ढीठ, धर्षण करनेवाले आप (वाजेभिः) विज्ञान और अन्न आदि के करनेवाले (नियुद्भिः) निश्चित कारण तथा (गोमद्भिः) प्रशंसित भूमि, गौ और वाणी से युक्त (अश्वभिः) सूर्य्य और चन्द्रमा आदिकों से (नः) हम लोगों के (कामम्) मनोरथ की (आ) सब प्रकार से (पृण) पूर्त्ति करिये ॥२१॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो आप हम लोगों के मनोरथ की पूर्त्ति करिये तो हम लोग भी आपकी इच्छा की पूर्त्ति करें ॥२१॥